ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 441, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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निर्वाहका हेतु है और जो समस्त प्राणियोंका आश्रय है, ऐसे इस जगत्-रूप ब्रह्मचक्रमें अर्थात् परब्रह्म परमात्माद्वारा संचालित तथा परमात्माके ही विराट् शरीररूप संसारचक्रमें यह जीवात्मा अपने कर्मोंके अनुसार उन परमात्माद्वारा घुमाया जाता है। जबतक यह इसके संचालकको जानकर उनका कृपापात्र नहीं बन जाता, अपनेको उनका प्रिय नहीं बना लेता, तबतक इसका इस चक्रसे छूटकारा नहीं हो सकता। जब यह अपनेको और सबके प्रेरक परमात्माको भलीभाँति पृथक्-पृथक् समझ लेता है कि उन्हींके घुमानेसे मैं इस संसारचक्रमें घूम रहा हूँ और उन्हींकी कृपासे छूट सकता हूँ, तब वह उन परमेश्वरका प्रिय बनकर उनके द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है (क० १।२।२३; मुण्डक० ३।२।३)। फिर तो वह अमृतभावको प्राप्त हो जाता है, जन्म-मरणरूप संसारचक्रसे सदाके लिये छूट जाता है। परम शान्ति एवं सनातन दिव्य परमधामको प्राप्त हो जाता है (गीता १८।६१-६२)॥६॥
उद्गीतमेतत् परमं तु ब्रह्म तस्मिंस्त्रयं सुप्रतिष्ठाक्षरं च। अत्रान्तरं ब्रह्मविदो विदित्वा लीना ब्रह्मणि तत्परा योनिमुक्ताः॥७॥
एतत्=यह; उद्गीतम्=वेदवर्णित; परमम् ब्रह्म=परब्रह्म; तु=ही; सुप्रतिष्ठा=सर्वश्रेष्ठ आश्रय; च=और; अक्षरम्=अविनाशी है; तस्मिन्=उसमें; त्रयम्=तीनों लोक स्थित हैं; ब्रह्मविदः=वेदके तत्त्वको जाननेवाले महापुरुष; अत्र=यहाँ (हृदयमें); अन्तरम्=अन्तर्यामीरूपसे स्थित उस ब्रह्मको; विदित्वा=जानकर; तत्परा=उसीके परायण हो; ब्रह्मणि=उस परब्रह्ममें; लीना=लीन होकर; योनिमुक्ताः=सदाके लिये जन्म-मृत्युसे मुक्त हो गये॥७॥
व्याख्या—जिनकी महिमाका वेदोंमें गान किया गया है, जो परब्रह्म परमात्मा सबके सर्वोत्तम आश्रय हैं, उन्हींमें तीनों लोकोंका समुदायरूप समस्त विश्व स्थित है। वे ही ऊपर बताये हुए सबके प्रेरक, कभी नाश न होनेवाले