ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 440, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
भी ज्ञान हैं, सब मनकी ही तो वृत्तियाँ हैं। मन न हो तो इन्द्रियोंके सचेष्ट रहनेपर भी किसी प्रकारका ज्ञान नहीं होता। यह मन ही संसाररूप नदीका मूल है। मनसे ही संसारकी सृष्टि होती है। सारा जगत् मनकी ही कल्पना है। मनके अमन हो जानेपर—नाश हो जानेपर जगत्का अस्तित्व इस रूपमें नहीं रहता। जबतक मन है, तभीतक संसारचक्र है। इन्द्रियोंके शब्द, स्पर्श आदि पाँच विषय ही इस संसाररूप नदीमें आवर्त अर्थात् भँवर हैं। इन्हींमें फँसकर जीव जन्म-मृत्युके चक्करमें पड़ जाता है। गर्भका दुःख, जन्मका दुःख, बुढ़ापेका दुःख, रोगका दुःख और मृत्युका दुःख—ये पाँच प्रकारके दुःख ही इस नदीके प्रवाहमें वेगरूप हैं। इन्हींके थपेड़ोंसे जीव व्याकुल रहता है और इस योनिसे उस योनिमें भटकता रहता है। अविद्या (अज्ञान), अस्मिता (अहंकार), राग (प्रिय-बुद्धि), द्वेष (अप्रियबुद्धि) और अभिनिवेश (मृत्युभय)—ये पञ्चविध क्लेश ही इस संसाररूप नदीके पाँच पर्व अर्थात् विभाग हैं। इन्हीं पाँच विभागोंमें यह जगत् बैठा हुआ है। इन पाँचोंका समुदाय ही संसारका स्वरूप है और अन्तःकरणकी पचास वृत्तियाँ ही इस नदीके पचास भेद अर्थात् भिन्न-भिन्न रूप हैं। अन्तःकरणकी वृत्तियोंको लेकर ही संसारमें भेदकी प्रतीति होती है ॥ ५ ॥
| सर्वाजीवे | सर्वसंस्थे | बृहन्ते |
|---|---|---|
| अस्मिन् | हंसो | भ्राम्यते |
| पृथगात्मानं | प्रेरितारं | च |
| जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति | ॥ ६ ॥ |
अस्मिन्=इस; सर्वाजीवे=सबके जीविकारूप; सर्वसंस्थे=सबके आश्रयभूत; बृहन्ते=विस्तृत; ब्रह्मचक्रे=ब्रह्मचक्रमें; हंसः=जीवात्मा; भ्राम्यते=घुमाया जाता है; [ सः ]=वह; आत्मानम्=अपने-आपको; च=और; प्रेरितारम्=सबके प्रेरक परमात्माको; पृथक्=अलग-अलग, मत्वा=जानकर; ततः=उसके बाद; तेन=उस परमात्मासे; जुष्टः=स्वीकृत होकर; अमृतत्वम्=अमृतभावको; एति=प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥
व्याख्या—जिसका वर्णन पहले किया जा चुका है, जो सबके जीवन-