ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 439, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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नाभिके स्थानमें अज्ञान है। जिस प्रकार नाभि ही चक्केका केन्द्र है, उसी प्रकार अज्ञान इस जगत्का केन्द्र है ॥ ४ ॥
पञ्चस्रोतोऽम्बुं
पञ्चप्राणोर्मिम्
पञ्चावर्ता
पञ्चाशद्भेदां
पञ्चयोऽन्युगवक्रां
पञ्चबुद्ध्यादिमूलाम्
पञ्चदुःखौघवेगां
पञ्चपर्वामधीमः ॥ ५ ॥
पञ्चस्रोतोऽम्बुम्=पाँच स्रोतोंसे आनेवाले विषयरूप जलसे युक्त; पञ्चयोऽन्युगवक्राम्=पाँच स्थानोंसे उत्पन्न होकर भयानक और टेढ़ी-मेढ़ी चालसे चलनेवाली; पञ्चप्राणोर्मिम्=पाँच प्राणरूप तरङ्गोंवाली; पञ्चबुद्ध्यादिमूलाम्=पाँच प्रकारके ज्ञानका आदि कारण मन ही है मूल जिसका; पञ्चावर्ताम्=पाँच भँवरोंवाली; पञ्चदुःखौघवेगाम्=पाँच दुःखरूप प्रवाहके वेगसे युक्त; पञ्चपर्वाम्=पाँच पर्वोंवाली; (और) पञ्चाशद्भेदाम्=पचास भेदोंवाली (नदीको); अधीमः=हमलोग जानते हैं ॥ ५ ॥
व्याख्या —इस मन्त्रमें संसारका नदीके रूपमें वर्णन किया गया है। वे ब्रह्मज्ञ ऋषि कहते हैं—हम एक ऐसी नदीको देख रहे हैं, जिसमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ही पाँच स्रोत हैं। संसारका ज्ञान हमें पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा ही होता है, इन्हींमेंसे होकर संसारका प्रवाह बहता है। इसीलिये इन्द्रियोंको यहाँ स्रोत कहा गया है। ये इन्द्रियाँ पञ्च सूक्ष्मभूतों (तन्मात्रों)से उत्पन्न हुई हैं, इसीलिये इस नदीके पाँच उद्गम-स्थान माने गये हैं। इस नदीका प्रवाह बड़ा ही भयंकर है। इसमें गिर जानेसे बार-बार जन्म-मृत्युका क्लेश उठाना पड़ता है। संसारकी चाल बड़ी टेढ़ी है, कपटसे भरी है। इसमेंसे निकलना कठिन है। इसीलिये इस संसाररूप नदीको वक्र कहा गया है। जगत्के जीवोंमें जो कुछ भी चेष्टा—हलचल होती है, वह प्राणोंके द्वारा ही होती है। इसीलिये प्राणोंको इस भव-सरिताकी तरङ्गमाला कहा गया है। नदीमें हलचल तरङ्गोंसे ही होती है। पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा होनेवाले चाक्षुष आदि पाँच प्रकारके ज्ञानोंका आदि कारण मन है, जितने