भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

अध्याय १ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

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नाभिके स्थानमें अज्ञान है। जिस प्रकार नाभि ही चक्केका केन्द्र है, उसी प्रकार अज्ञान इस जगत्का केन्द्र है ॥ ४ ॥

पञ्चस्रोतोऽम्बुं

पञ्चप्राणोर्मिम्

पञ्चावर्ता

पञ्चाशद्भेदां

पञ्चयोऽन्युगवक्रां

पञ्चबुद्ध्यादिमूलाम्

पञ्चदुःखौघवेगां

पञ्चपर्वामधीमः ॥ ५ ॥

पञ्चस्रोतोऽम्बुम्=पाँच स्रोतोंसे आनेवाले विषयरूप जलसे युक्त; पञ्चयोऽन्युगवक्राम्=पाँच स्थानोंसे उत्पन्न होकर भयानक और टेढ़ी-मेढ़ी चालसे चलनेवाली; पञ्चप्राणोर्मिम्=पाँच प्राणरूप तरङ्गोंवाली; पञ्चबुद्ध्यादिमूलाम्=पाँच प्रकारके ज्ञानका आदि कारण मन ही है मूल जिसका; पञ्चावर्ताम्=पाँच भँवरोंवाली; पञ्चदुःखौघवेगाम्=पाँच दुःखरूप प्रवाहके वेगसे युक्त; पञ्चपर्वाम्=पाँच पर्वोंवाली; (और) पञ्चाशद्भेदाम्=पचास भेदोंवाली (नदीको); अधीमः=हमलोग जानते हैं ॥ ५ ॥

व्याख्या —इस मन्त्रमें संसारका नदीके रूपमें वर्णन किया गया है। वे ब्रह्मज्ञ ऋषि कहते हैं—हम एक ऐसी नदीको देख रहे हैं, जिसमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ ही पाँच स्रोत हैं। संसारका ज्ञान हमें पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा ही होता है, इन्हींमेंसे होकर संसारका प्रवाह बहता है। इसीलिये इन्द्रियोंको यहाँ स्रोत कहा गया है। ये इन्द्रियाँ पञ्च सूक्ष्मभूतों (तन्मात्रों)से उत्पन्न हुई हैं, इसीलिये इस नदीके पाँच उद्गम-स्थान माने गये हैं। इस नदीका प्रवाह बड़ा ही भयंकर है। इसमें गिर जानेसे बार-बार जन्म-मृत्युका क्लेश उठाना पड़ता है। संसारकी चाल बड़ी टेढ़ी है, कपटसे भरी है। इसमेंसे निकलना कठिन है। इसीलिये इस संसाररूप नदीको वक्र कहा गया है। जगत्के जीवोंमें जो कुछ भी चेष्टा—हलचल होती है, वह प्राणोंके द्वारा ही होती है। इसीलिये प्राणोंको इस भव-सरिताकी तरङ्गमाला कहा गया है। नदीमें हलचल तरङ्गोंसे ही होती है। पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा होनेवाले चाक्षुष आदि पाँच प्रकारके ज्ञानोंका आदि कारण मन है, जितने

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

भी ज्ञान हैं, सब मनकी ही तो वृत्तियाँ हैं। मन न हो तो इन्द्रियोंके सचेष्ट रहनेपर भी किसी प्रकारका ज्ञान नहीं होता। यह मन ही संसाररूप नदीका मूल है। मनसे ही संसारकी सृष्टि होती है। सारा जगत् मनकी ही कल्पना है। मनके अमन हो जानेपर—नाश हो जानेपर जगत्का अस्तित्व इस रूपमें नहीं रहता। जबतक मन है, तभीतक संसारचक्र है। इन्द्रियोंके शब्द, स्पर्श आदि पाँच विषय ही इस संसाररूप नदीमें आवर्त अर्थात् भँवर हैं। इन्हींमें फँसकर जीव जन्म-मृत्युके चक्करमें पड़ जाता है। गर्भका दुःख, जन्मका दुःख, बुढ़ापेका दुःख, रोगका दुःख और मृत्युका दुःख—ये पाँच प्रकारके दुःख ही इस नदीके प्रवाहमें वेगरूप हैं। इन्हींके थपेड़ोंसे जीव व्याकुल रहता है और इस योनिसे उस योनिमें भटकता रहता है। अविद्या (अज्ञान), अस्मिता (अहंकार), राग (प्रिय-बुद्धि), द्वेष (अप्रियबुद्धि) और अभिनिवेश (मृत्युभय)—ये पञ्चविध क्लेश ही इस संसाररूप नदीके पाँच पर्व अर्थात् विभाग हैं। इन्हीं पाँच विभागोंमें यह जगत् बैठा हुआ है। इन पाँचोंका समुदाय ही संसारका स्वरूप है और अन्तःकरणकी पचास वृत्तियाँ ही इस नदीके पचास भेद अर्थात् भिन्न-भिन्न रूप हैं। अन्तःकरणकी वृत्तियोंको लेकर ही संसारमें भेदकी प्रतीति होती है ॥ ५ ॥

सर्वाजीवेसर्वसंस्थेबृहन्ते
अस्मिन्हंसोभ्राम्यते
पृथगात्मानंप्रेरितारं
जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति॥ ६ ॥

अस्मिन्=इस; सर्वाजीवे=सबके जीविकारूप; सर्वसंस्थे=सबके आश्रयभूत; बृहन्ते=विस्तृत; ब्रह्मचक्रे=ब्रह्मचक्रमें; हंसः=जीवात्मा; भ्राम्यते=घुमाया जाता है; [ सः ]=वह; आत्मानम्=अपने-आपको; च=और; प्रेरितारम्=सबके प्रेरक परमात्माको; पृथक्=अलग-अलग, मत्वा=जानकर; ततः=उसके बाद; तेन=उस परमात्मासे; जुष्टः=स्वीकृत होकर; अमृतत्वम्=अमृतभावको; एति=प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥

व्याख्या—जिसका वर्णन पहले किया जा चुका है, जो सबके जीवन-

अध्याय १ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

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निर्वाहका हेतु है और जो समस्त प्राणियोंका आश्रय है, ऐसे इस जगत्-रूप ब्रह्मचक्रमें अर्थात् परब्रह्म परमात्माद्वारा संचालित तथा परमात्माके ही विराट् शरीररूप संसारचक्रमें यह जीवात्मा अपने कर्मोंके अनुसार उन परमात्माद्वारा घुमाया जाता है। जबतक यह इसके संचालकको जानकर उनका कृपापात्र नहीं बन जाता, अपनेको उनका प्रिय नहीं बना लेता, तबतक इसका इस चक्रसे छूटकारा नहीं हो सकता। जब यह अपनेको और सबके प्रेरक परमात्माको भलीभाँति पृथक्-पृथक् समझ लेता है कि उन्हींके घुमानेसे मैं इस संसारचक्रमें घूम रहा हूँ और उन्हींकी कृपासे छूट सकता हूँ, तब वह उन परमेश्वरका प्रिय बनकर उनके द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है (क० १।२।२३; मुण्डक० ३।२।३)। फिर तो वह अमृतभावको प्राप्त हो जाता है, जन्म-मरणरूप संसारचक्रसे सदाके लिये छूट जाता है। परम शान्ति एवं सनातन दिव्य परमधामको प्राप्त हो जाता है (गीता १८।६१-६२)॥६॥

उद्गीतमेतत् परमं तु ब्रह्म तस्मिंस्त्रयं सुप्रतिष्ठाक्षरं च। अत्रान्तरं ब्रह्मविदो विदित्वा लीना ब्रह्मणि तत्परा योनिमुक्ताः॥७॥

एतत्=यह; उद्गीतम्=वेदवर्णित; परमम् ब्रह्म=परब्रह्म; तु=ही; सुप्रतिष्ठा=सर्वश्रेष्ठ आश्रय; च=और; अक्षरम्=अविनाशी है; तस्मिन्=उसमें; त्रयम्=तीनों लोक स्थित हैं; ब्रह्मविदः=वेदके तत्त्वको जाननेवाले महापुरुष; अत्र=यहाँ (हृदयमें); अन्तरम्=अन्तर्यामीरूपसे स्थित उस ब्रह्मको; विदित्वा=जानकर; तत्परा=उसीके परायण हो; ब्रह्मणि=उस परब्रह्ममें; लीना=लीन होकर; योनिमुक्ताः=सदाके लिये जन्म-मृत्युसे मुक्त हो गये॥७॥

व्याख्या—जिनकी महिमाका वेदोंमें गान किया गया है, जो परब्रह्म परमात्मा सबके सर्वोत्तम आश्रय हैं, उन्हींमें तीनों लोकोंका समुदायरूप समस्त विश्व स्थित है। वे ही ऊपर बताये हुए सबके प्रेरक, कभी नाश न होनेवाले

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

परम अक्षर, परम देव हैं। जिन्होंने ध्यानयोगमें स्थित होकर परमात्माकी दिव्यशक्तिका दर्शन किया था, वे वेदके रहस्यको समझनेवाले ऋषिलोग उन सबके प्रेरक परमात्माको यहाँ—अपने हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान समझकर, उन्हींके परायण होकर अर्थात् सर्वतोभावसे उनकी शरणमें जाकर, उन्हींमें लीन हो गये और सदाके लिये जन्म-मरणरूप योनिसे मुक्त हो गये। उनके मार्गका अनुसरण करके हम सब लोग भी उन्हींकी भाँति जन्म-मरणसे छूटकर परमात्मामें लीन हो सकते हैं ॥७॥

सम्बन्ध— अब उन परमात्माके स्वरूपका वर्णन करके उन्हें जाननेका फल बताया जाता है—

संयुक्तमेतत् क्षरमक्षरं च व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्वमीशः । अनीशश्चात्मा बध्यते भोक्तृभावा- ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥८॥

क्षरम्=विनाशशील जडवर्ग; च=एवं; अक्षरम्=अविनाशी जीवात्मा; संयुक्तम्=(इन दोनोंके) संयोगसे बने हुए; व्यक्ताव्यक्तम्=व्यक्त और अव्यक्तस्वरूप; एतत् विश्वम्=इस विश्वको; ईशः=परमेश्वर ही; भरते=धारण और पोषण करता है; च=तथा; आत्मा=जीवात्मा; भोक्तृभावात्=इस जगत्के विषयोंका भोक्ता बना रहनेके कारण; अनीशः=प्रकृतिके अधीन असमर्थ हो; बध्यते=इसमें बँध जाता है; (और) देवम्=उस परमदेव परमेश्वरको; ज्ञात्वा=जानकर; सर्वपाशैः=सब प्रकारके बन्धनोंसे; मुच्यते=मुक्त हो जाता है ॥८॥

व्याख्या— विनाशशील जडवर्ग जिसे भगवान्की अपरा प्रकृति तथा क्षरतत्त्व कहा गया है और भगवान्की परा प्रकृतिरूप जीवसमुदाय, जो अक्षरतत्त्वके नामसे पुकारा जाता है—इन दोनोंके संयोगसे बने हुए, प्रकट (स्थूल) और अप्रकट (सूक्ष्म) रूपमें स्थित इस समस्त जगत्का वे परमपुरुष पुरुषोत्तम ही धारण-पोषण करते हैं, जो सबके स्वामी, सबके प्रेरक तथा सबका यथायोग्य संचालन और नियमन करनेवाले परमेश्वर हैं। जीवात्मा इस जगत्के

अध्याय १ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

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विषयोंका भोक्ता बना रहनेके कारण प्रकृतिके अधीन हो इसके मोहजालमें फँसा रहता है, उन परमदेव परमात्माकी ओर दृष्टिपात नहीं करता। जब कभी यह उन सर्वसुहृद परमात्माकी अहेतुकी दयासे महापुरुषोंका सङ्ग पाकर उनको जाननेका अभिलाषी होकर पूर्ण चेष्टा करता है, तब उन परमदेव परमेश्वरको जानकर सब प्रकारके बन्धनोंसे सदाके लिये मुक्त हो जाता है ॥ ८ ॥

सम्बन्ध— पुनः जीवात्मा, परमात्मा और प्रकृति—इन तीनोंके स्वरूपका पृथक्-पृथक् वर्णन करके, इस तत्त्वको जानकर उपासना करनेका फल दो मन्त्रोंद्वारा बताया जाता है—

ज्ञाज्ञौद्व्रावजावीशनीशा-
वजाहोका
अनन्तश्चात्माविश्वरूपो
त्रयंयदा

ज्ञाज्ञौ=सर्वज्ञ और अज्ञानी; ईशनीशौ=सर्वसमर्थ और असमर्थ; द्वौ=ये दो; अज्ञौ=अजन्मा आत्मा हैं; हि=तथा इनके सिवा; भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता=भोगनेवाले जीवात्माके लिये उपयुक्त भोग्य-सामग्रीसे युक्त; अज्ञा=अनादि प्रकृति; एका=एक तीसरी शक्ति है; (इन तीनोंमें जो ईश्वरतत्त्व है, वह शेष दोसे विलक्षण है) हि=क्योंकि; आत्मा=वह परमात्मा; अनन्तः=अनन्त; विश्वरूपः=सम्पूर्ण रूपोंवाला; च=और; अकर्ता=कर्तापनके अभिमानसे रहित है; यदा=जब; (मनुष्य इस प्रकार) एतत् त्रयम्=ईश्वर, जीव और प्रकृति—इन तीनोंको; ब्रह्मम्=ब्रह्मरूपमें; विन्दते=प्राप्त कर लेता है (तब वह सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है) ॥ ९ ॥

व्याख्या— ईश्वर सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् हैं, जीव अल्पज्ञ और अल्प शक्तिवाला है; ये दोनों ही अजन्मा हैं। इनके सिवा एक तीसरी शक्ति भी अजन्मा है जिसे प्रकृति कहते हैं; यह भोक्ता जीवात्माके लिये उपयुक्त भोग-सामग्री प्रस्तुत करती है। यद्यपि ये तीनों ही अजन्मा हैं—अनादि हैं, फिर भी ईश्वर शेष दो तत्त्वोंसे विलक्षण हैं; क्योंकि वे परमात्मा अनन्त हैं।

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

(गीता १५।१६-१७) सम्पूर्ण विश्व उन्हींका स्वरूप—विराट शरीर है। वे सब कुछ करते हुए—सम्पूर्ण विश्वकी उत्पत्ति, पालन और संहार करते हुए भी वास्तवमें कुछ नहीं करते; क्योंकि वे कर्तापनके अभिमानसे रहित हैं। (गीता ४।१३) मनुष्य जब इस प्रकार इन तीनोंकी विलक्षणता और विभिन्नताको समझते हुए ही इन्हें ब्रह्मरूपमें उपलब्ध कर लेता है अर्थात् प्रकृति और जीव तो उन परमेश्वरकी प्रकृतियाँ हैं और परमेश्वर इनके स्वामी हैं—इस प्रकार प्रत्यक्ष कर लेता है, तब वह सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है॥१॥

सम्बन्ध— पहले, आठवें और नवें मन्त्रमें कहे हुए तीनों तत्त्वोंका स्पष्टीकरण अगले मन्त्रमें किया जाता है—

क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः। तस्याभिध्यानाद् योजनात् तत्त्वभावाद् भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः॥१०॥

प्रधानम् =प्रकृति तो; क्षरम् =विनाशशील है; हरः =इनको भोगनेवाला जीवात्मा; अमृताक्षरम् =अमृतस्वरूप अविनाशी है; क्षरात्मानौ =इन विनाशशील जड़-तत्त्व और चेतन आत्मा—दोनोंको; एकः =एक; देवः =ईश्वर; ईशते =अपने शासनमें रखता है; (इस प्रकार जानकर) तस्य =उसका; अभिध्यानात् =निरन्तर ध्यान करनेसे; योजनात् =मनको उसमें लगाये रहनेसे; =तथा; तत्त्वभावात् =तन्मय हो जानेसे; अन्ते =अन्तमें (उसीको प्राप्त हो जाता है); भूयः =फिर; विश्वमायानिवृत्तिः =समस्त मायाकी निवृत्ति हो जाती है॥१०॥

व्याख्या— प्रकृति तो क्षर अर्थात् परिवर्तन होनेवाली, विनाशशील है और इसको भोगनेवाला जीव-समुदाय अविनाशी अक्षरतत्त्व है। (गीता ७।४-५; १५।१६) इन क्षर और अक्षर (जड़प्रकृति और चेतन जीव-समुदाय)—दोनों तत्वोंपर एक परमदेव परमेश्वर शासन करते हैं, (गीता १५।१७) वे ही प्राप्त करनेके और जाननेके योग्य हैं, उन्हें तत्वोंसे जानना चाहिये—इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उन परमदेव परमात्माका निरन्तर ध्यान करनेसे, उन्हींमें रात-दिन

अध्याय १ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

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संग्रह रहनेसे और उन्हींमें तन्मय हो जानेसे अन्तमें यह उन्हींको पा लेता है। फिर इसके सम्पूर्ण मायाकी सर्वथा निवृत्ति हो जाती है, अर्थात् मायामय जगत्से इसका सम्बन्ध सर्वथा छूट जाता है ॥१०॥

सम्बन्ध— उन परमदेवको जाननेका फल पुनः बताया जाता है—

ज्ञात्वादेवंसर्वपाशापहानिः
क्षीणैःक्लेशैर्जन्ममृत्युप्रहाणिः।
तस्याभिध्यानात्तृतीयंदेहभेदे
विश्वैश्वर्यंकेवलंआसकामः ॥ ११ ॥

तस्य=उस परमदेवका; अभिध्यानात्=निरन्तर ध्यान करनेसे; देवम्=उस प्रकाशमय परमात्माको; ज्ञात्वा=जान लेनेपर; सर्वपाशापहानिः=समस्त बन्धनोंका नाश हो जाता है; (क्योंकि) क्लेशैः क्षीणैः=क्लेशोंका नाश हो जानेके कारण; जन्ममृत्युप्रहाणिः=जन्म-मृत्युका सर्वथा अभाव हो जाता है; (अतः वह) देहभेदे=शरीरका नाश होनेपर; तृतीयम्=तीसरे लोक (स्वर्ग) तकके; विश्वैश्वर्यम् [ त्यक्त्वा ]=समस्त ऐश्वर्यका त्याग करके; केवलः=सर्वथा विशुद्ध; आसकामः=पूर्णकाम हो जाता है ॥११॥

व्याख्या— परमपुरुष परमात्माका निरन्तर ध्यान करते-करते जब साधक उन परमदेवको जान लेता है, तब इसके समस्त बन्धनोंका सदाके लिये सर्वथा नाश हो जाता है; क्योंकि अविद्या, अस्मिता (अहंकार) राग, द्वेष और मरणभय—इन पाँचों क्लेशोंका नाश हो जानेके कारण उसके जन्म-मरणका सदाके लिये अभाव हो जाता है। अतः वह फिर कभी बन्धनमें नहीं पड़ सकता। वह इस शरीरका नाश होनेपर तृतीय लोक अर्थात् स्वर्गके सबसे ऊँचे स्तर—ब्रह्मलोकतकके बड़े-से-बड़े समस्त ऐश्वर्योंका त्याग करके प्रकृतिसे वियुक्त, सर्वथा विशुद्ध कैवल्यपदको प्राप्त हो पूर्णकाम हो जाता है—उसे किसी प्रकारकी कामना नहीं रहती; क्योंकि वह सम्पूर्ण कामनाओंका फल पा लेता है ॥११॥

सम्बन्ध— जानने योग्य तत्त्वका पुनः वर्णन किया जाता है—

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

एतन्त्रेयं

नित्यमेवात्मसंस्थं

नातः परं वेदितव्यं हि किंचित्।

भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा

सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत् ॥ १२ ॥

आत्मसंस्थम्=अपने ही भीतर स्थित; एतत्=इस ब्रह्मको; एव=ही; नित्यम्=सर्वदा; ज्ञेयम्=जानना चाहिये; हि=क्योंकि; अतः परम्=इससे बढ़कर; वेदितव्यम्=जानने योग्य तत्त्व; किञ्चित्=दूसरा कुछ भी; न=नहीं है; भोक्ता=भोक्ता (जीवात्मा); भोग्यम्=भोग्य (जडवर्ग); च=और; प्रेरितारम्=उनके प्रेरक परमेश्वर; मत्वा=(इन तीनोंको) जानकर; (मनुष्य) सर्वम्=सब कुछ (जान लेता है); एतत्=(इस प्रकार) यह; त्रिविधम्=तीन भेदोंमें; प्रोक्तम्=बताया हुआ ही; ब्रह्मम्=ब्रह्म है ॥ १२ ॥

व्याख्या—ये परमदेव परब्रह्म पुरुषोत्तम अपने ही भीतर—हृदयमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं। इनको जाननेके लिये कहीं बाहर जानेकी आवश्यकता नहीं है। इहाँको सदा जाननेकी चेष्टा करनी चाहिये; क्योंकि इनसे बढ़कर जानने योग्य दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं। इन एकको जाननेसे ही सबका ज्ञान हो जाता है, ये ही सबके कारण और परमाधार हैं। मनुष्य भोक्ता (जीवात्मा), भोग्य (जडवर्ग) और इन दोनोंके प्रेरक ईश्वरको जानकर सब कुछ जान लेता है। फिर कुछ भी जानना शेष नहीं रहता। जिनके ये तीन भेद बताये गये हैं, वे ही समग्र ब्रह्म हैं अर्थात् जड प्रकृति, चेतन आत्मा और उन दोनोंके आधार तथा नियामक परमात्मा—ये तीनों ब्रह्मके ही रूप हैं ॥ १२ ॥

सम्बन्ध—उक्त ज्ञेयतत्त्वको जाननेका उपाय बताया जाता है—

वहैर्धृथायोनिगतस्यमूर्ति-
नंदृश्यतेनैव च लिङ्गनाशः।
भूयएवेन्धनयोनिगृह्ण-
स्तद्वोभयंवैप्रणवेन देहे ॥ १३ ॥

यथा=जिस प्रकार; योनिगतस्य=योनि अर्थात् आश्रयभूत काष्ठमें स्थित; वहैः=अग्निका; मूर्तिः=रूप; न दृश्यते=नहीं दीखता; च=और; लिङ्गनाशः=उसके

अध्याय १ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

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चिह्नाका (सत्ताका) नाश; एव=भी; न=नहीं होता; (क्योंकि) सः=वह; भूयः एव=चैष्टा करनेपर फिर भी अवश्य; इन्धनयोनिरगृह्यः=ईंधनरूप अपनी योनिमें ग्रहण किया जा सकता है; वा=उसी प्रकार; तत् उभयम्=वे दोनों (जीवात्मा और परमात्मा); देहे=शरीरमें; वै=ही; प्रणवेन=ॐकारके द्वारा (साधन करनेपर); [गृह्यते]=ग्रहण किये जा सकते हैं ॥ १३ ॥

व्याख्या —जिस प्रकार अपनी योनि अर्थात् प्रकट होनेके स्थानविशेष काष्ठ आदिमें स्थित अग्निका रूप दिखलायी नहीं देता। परंतु इस कारण यह नहीं समझा जाता कि अग्नि नहीं है—उसका होना अवश्य माना जाता है; क्योंकि उसकी सत्ता मानकर अरणियोंका मन्थन करनेपर ईंधनरूप अपने स्थानमेंसे वह फिर भी ग्रहण किया जा सकता है। उसी प्रकार उपर्युक्त जीवात्मा और परमात्मा हृदयरूप अपने स्थानमें छिपे रहकर प्रत्यक्ष नहीं होते, परंतु ॐके जपद्वारा साधन करनेपर इस शरीरमें ही इनका साक्षात्कार किया जा सकता है—इसमें कुछ भी संदेह नहीं है ॥ १३ ॥

सम्बन्ध —ॐकारके द्वारा साधक किस प्रकार उन परमात्माका साक्षात् करे, इस जिज्ञासापर कहा जाता है—

स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तररणिम् । ध्याननिर्मथनाभ्यासाद् देवं पश्येन्निरगृह्यत् ॥ १४ ॥

स्वदेहम्=अपने शरीरको; अरणिम्=नीचेकी अरणि; च=और; प्रणवम्=प्रणवको; उत्तररणिम्=ऊपरकी अरणि; कृत्वा=बनाकर; ध्याननिर्मथनाभ्यासात्=ध्यानके द्वारा निरन्तर मन्थन करते रहनेसे; (साधक) निगृह्यत्=छिपी हुई अग्निकी भाँति; (हृदयमें स्थित) देवम्=परमदेव परमेश्वरको; पश्येत्=देखे ॥ १४ ॥

व्याख्या —अग्निको प्रकट करनेके लिये जैसे दो अरणियोंका मन्थन किया जाता है, उसी प्रकार अपने शरीरमें परम पुरुष परमात्माको प्राप्त करनेके लिये शरीरको तो नीचेकी अरणि बनाना चाहिये और ॐकारको ऊपरकी अरणि। अर्थात् शरीरको नीचेकी अरणिकी भाँति समभावसे निश्चल स्थित करके ऊपरकी अरणिकी भाँति ॐकारका वाणीद्वारा जप और मनसे उसके

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय १ ]

अर्थस्वरूप परमात्माका निरन्तर चिन्तन करना चाहिये। इस प्रकार इस ध्यानरूप मन्थनके अभ्याससे साधकको काष्ठमें छिपी हुई अग्निकी भाँति अपने हृदयमें छिपे हुए परमदेव परमेश्वरको देख लेना—प्रत्यक्ष कर लेना चाहिये ॥ १४ ॥

तिलेषु तैलं दधनीव सर्पि- रापः स्नोतःस्वरणीषु चाग्निः ।

एवमात्माऽऽत्मनि गृह्यतेऽसौ सत्यैनं तपसा योऽनुपश्यति ॥ १५ ॥

तिलेषु=तिलोंमें; तैलम्=तेल; दधनि=दहीमें; सर्पिः=घी; स्नोतः=सु=स्नोतोंमें; आपः=जल; च=और; अरणीषु=अरणियोंमें; अग्निः=अग्नि; इव=जिस प्रकार छिपे रहते हैं; एवम्=उसी प्रकार; असौ=वह; आत्मा=परमात्मा; आत्मनि=अपने हृदयमें छिपा हुआ है; यः=जो कोई साधक; एनम्=इसको; सत्येन=सत्यके द्वारा; (और) तपसा=संयमरूप तपसे; अनुपश्यति=देखता रहता है—चिन्तन करता रहता है; [ तेन ]=उसके द्वारा; गृह्यते=वह ग्रहण किया जाता है ॥ १५ ॥

व्याख्या—जिस प्रकार तिलोंमें तेल, दहीमें घी, ऊपरसे सूखी हुई नदीके भीतरी स्नोतोंमें जल तथा अरणियोंमें अग्नि छिपी रहती है, उसी प्रकार परमात्मा हमारे हृदयरूप गुफामें छिपे हैं। जिस प्रकार अपने-अपने स्थानमें छिपे हुए तेल आदि उनके लिये बताये हुए उपायोंसे उपलब्ध किये जा सकते हैं, उसी प्रकार जो कोई साधक विषयोंसे विरक्त होकर सदाचार, सत्यभाषण तथा संयमरूप तपस्याके द्वारा साधन करता हुआ पूर्वोक्त प्रकारसे उनका निरन्तर ध्यान करता रहता है, उनके द्वारा वे परब्रह्म परमात्मा भी प्राप्त किये जा सकते हैं ॥ १५ ॥

सर्वव्यापिणमात्मानं क्षीरे सर्पिरिर्वार्पितम् । आत्मविद्यातपोमूलं तद् ब्रह्मोपनिषत् परम् ॥ तद् ब्रह्मोपनिषत् परम् ॥ १६ ॥

क्षीरे=दूधमें; अर्पितम्=स्थित; सर्पिः इव=घीकी भाँति; सर्वव्यापिणम्=

अध्याय २ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

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सर्वत्र परिपूर्ण; आत्मविद्यातपोमूलम्=आत्मविद्या तथा तपसे प्राप्त होनेवाले; आत्मानम्=परमात्माको (वह पूर्वोक्त साधक जान लेता है); तत्=वह; उपनिषत्=उपनिषदोंमें बताया हुआ; परम्=परमतत्त्व; ब्रह्म=ब्रह्म है; तत्=वह; उपनिषत्=उपनिषदोंमें बताया हुआ; परम्=परमतत्त्व; ब्रह्म=ब्रह्म है ॥ १६ ॥

व्याख्या —आत्मविद्या और तप जिनकी प्राप्ति के मूलभूत साधन हैं तथा जो दूधमें स्थित घीकी भाँति सर्वत्र परिपूर्ण हैं, उन सर्वोत्तरीयों परमात्माको वह पूर्वोक्त साधक जान लेता है। वे ही उपनिषदोंमें वर्णित परम तत्त्व ब्रह्म हैं। वे ही उपनिषदोंमें वर्णित परम तत्त्व ब्रह्म हैं। अन्तिम वाक्यकी पुनरावृत्ति अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ॥ १६ ॥

॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥

द्वितीय अध्याय

सम्बन्ध —पहले अध्यायमें परमदेव परमात्माके साक्षात्कारका प्रधान उपाय ध्यानको बताया गया। उस ध्यानकी प्रक्रिया बतानेके लिये दूसरा अध्याय आरम्भ किया जाता है। इसमें पहले ध्यानकी सिद्धिके लिये पाँच मन्त्रोंमें परमेश्वरसे प्रार्थना करनेका प्रकार बताया जाता है—

युज्ञानः प्रथमं मनस्तत्त्वाय सविता धियः।

अग्रेज्यौतिर्निचाव्य पृथिव्या अध्याभरत ॥ १ ॥*

सविता=सबको उत्पन्न करनेवाला परमात्मा; प्रथमम्=पहले; मनः=हमारे मन; (और) धियः=बुद्धियोंको; तत्त्वाय=तत्त्वकी प्राप्तिके लिये; युज्ञानः=अपने स्वरूपमें लगते हुए; अग्रे=अग्रि (आदि इन्द्रियाभिानी देवताओं)की; ज्योतिः=ज्योति (प्रकाशन-सामर्थ्य) को; निचाव्य=अवलोकन करके; पृथिव्याः=पार्थिव पदार्थोंसे; अधि=ऊपर उठाकर; आभरत=हमारी इन्द्रियोंमें स्थापित करे ॥ १ ॥

  • यजुर्वेद अध्याय ११ मन्त्र १ इसी प्रकार है।

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

व्याख्या —सबको उत्पन्न करनेवाले परमात्मा पहले हमारे मन और बुद्धि की वृत्तियोंको तत्वकी प्राप्तिके लिये अपने दिव्य स्वरूपमें लगायें और अग्नि आदि इन्द्रियाभिमानी देवताओंकी जो विषयोंको प्रकाशित करनेकी सामर्थ्य है, उसे दृष्टिमें रखते हुए बाह्य विषयोंसे लौटाकर हमारी इन्द्रियोंमें स्थिरतापूर्वक स्थापित कर दें, जिससे हमारी इन्द्रियोंका प्रकाश बाहर न जाकर बुद्धि और मनकी स्थिरतामें सहायक हो ॥ १ ॥

युक्तेन मनसा वयं देवस्य सवितुः सवे। सुवर्गेयाय शक्त्या ॥ २ ॥*

वयम् =हमलोग; सवितुः =सबको उत्पन्न करनेवाले; देवस्य =परमदेव परमेश्वरकी; सवे =आराधनारूप यज्ञमें; युक्तेन मनसा =लगे हुए मनके द्वारा; सुवर्गेयाय =स्वर्गीय सुख (भगवत्-प्राप्ति-जनित आनन्द)की प्राप्तिके लिये; शक्त्या =पूरी शक्तिसे; [ प्रयतामहै ]=प्रयत्न करें ॥ २ ॥

व्याख्या —हमलोग सबको उत्पन्न करनेवाले, परमदेव परमेश्वरकी आराधनारूप यज्ञमें लगे हुए मनके द्वारा परमानन्दप्राप्तिके लिये पूर्णशक्तिसे प्रयत्न करें। अर्थात् हमारा मन निरन्तर भगवान्की आराधनामें लगा रहे और हम भगवत्-प्राप्ति-जनित परमानन्दकी अनुभूतिके लिये पूर्ण शक्तिसे प्रयत्नशील रहें ॥ २ ॥

युक्त्वाय मनसा देवान् सुवर्त्यतो धिया दिवम्।

बृहन्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्रसुवाति तान् ॥ ३ ॥†

सविता =सबको उत्पन्न करनेवाला परमेश्वर; सुवः =स्वर्गादि लोकोंमें; (और) दिवम् =आकाशमें; यतः =गमन करनेवाले; (तथा) बृहत् =बड़ा भारी; ज्योतिः =प्रकाश; करिष्यतः =फैलानेवाले; तान् =उन; (मन और इन्द्रियोंके अधिष्ठाता) देवान् =देवताओंको; मनसा =हमारे मन; (और) धिया =बुद्धिसे; युक्त्वाय =संयुक्त करके; (प्रकाश दान करनेके लिये) प्रसुवाति =प्रेरणा करता है अर्थात् करे ॥ ३ ॥

व्याख्या —वे सबको उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर मन और इन्द्रियोंके अधिष्ठाता देवताओंको, जो स्वर्ग आदि लोकोंमें और आकाशमें विचरनेवाले तथा

  • † ये दोनों मन्त्र यजुर्वेद अध्याय ११ के २ और ३ हैं।

अध्याय २ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

४४९

बड़ा भारी प्रकाश फैलानेवाले हैं, हमारे मन और बुद्धिसे संयुक्त करके हमें प्रकाश प्रदान करनेके लिये प्रेरणा करें; ताकि हम उन परमेश्वरका साक्षात् करनेके लिये ध्यान करनेमें समर्थ हों। हमारे मन, बुद्धि और इन्द्रियोंमें प्रकाश फैला रहे। निद्रा, आलस्य और अकर्मण्यता आदि दोष हमारे ध्यानमें विघ्न न कर सकें ॥ ३ ॥

युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपक्षितः । वि होत्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितुः परिष्णुतिः ॥ ४ ॥*

(जिसमें) विप्राः=ब्राह्मण आदि; मनः=मनको; युञ्जते=लगाते हैं; उत=और; धियः=बुद्धिकी वृत्तियोंको भी; युञ्जते=लगाते हैं; (जिसने समस्त) होत्राः वि दधे=अग्निहोत्र आदि शुभ कर्मोंका विधान किया है; (तथा जो) वयुनावित्=समस्त जगत्के विचारोंको जाननेवाला; (और) एकः=एक है; (उस) बृहतः=सबसे महान्; विप्रस्य=सर्वत्र व्यापक; विपक्षितः=सर्वज्ञ; (एवं) सवितुः=सबके उत्पादक; देवस्य=परमदेव परमेश्वरकी; इत्=निश्चय ही; (हमें) मही=महती; परिष्णुतिः=स्तुति (करनी चाहिये) ॥ ४ ॥

व्याख्या —जिन परब्रह्म परमात्मामें श्रेष्ठ बुद्धिवाले ब्राह्मणादि अधिकारी मनुष्य अपने मनको लगाते हैं तथा अपनी सब प्रकारकी बुद्धि-वृत्तियोंको भी नियुक्त करते हैं, जिन्होंने अग्निहोत्र आदि समस्त शुभ कर्मोंका विधान किया है, जो समस्त जगत्के विचारोंको जाननेवाले और एक—अद्वितीय हैं, उन सबसे महान्, सर्वव्यापी, सर्वज्ञ और सबके उत्पादक परमदेव परमेश्वरकी अवश्य ही हमें भूरि-भूरि स्तुति करनी चाहिये ॥ ४ ॥

युजे वां ब्रह्म पूर्वं नमोभि- र्वि श्लोक एतु पथ्येव सूरैः ।

  • यह यजुर्वेद अध्याय ११का चौथा और अध्याय ५ का १४ वां मन्त्र है तथा ऋग्वेद (५।८१।१) में भी है।

४५०

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः ॥ ५ ॥*

(हे मन और बुद्धि! मैं) वाम्=तुम दोनोंके (स्वामी); पूर्वम्=सबके आदि; ब्रह्म=पूर्णब्रह्म परमात्मासे; नमोभिः=बार-बार नमस्कारके द्वारा; युजे=संयुक्त होता हूँ; श्लोकः=मेरा वह स्तुति-पाठ; सुरेः=श्रेष्ठ विद्वान्की; पथ्या इव=कीर्तिकी भाँति; व्येतु (वि+एतु)=सर्वत्र फैल जाय; (जिससे) अमृतस्य=अविनाशी परमात्माके; विश्वे=समस्त; पुत्राः=पुत्र; ये=जो; दिव्यानि=दिव्य; धामानि=लोकोंमें; आतस्थुः=निवास करते हैं; शृण्वन्तु=सुनें ॥ ५ ॥

व्याख्या—हे मन और बुद्धि! मैं तुम दोनोंके स्वामी और समस्त जगत्के आदिकारण परब्रह्म परमात्माको बार-बार नमस्कार करके विनयपूर्वक उनकी शरणमें जाकर उनमें संलग्न होता हूँ। मेरे द्वारा जो उन परमेश्वरकी महिमाका वर्णन किया गया है, वह विद्वान् पुरुषकी कीर्तिके समान समस्त जगत्में व्याप्त हो जाय। उसे अविनाशी परमात्माके वे सभी पुत्र, जो दिव्य लोकोंमें निवास करते हैं, भलीभाँति सुनें ॥ ५ ॥

सम्बन्ध—ध्यानके लिये परमात्मासे स्तुति करनेका प्रकार बतलानेके अनन्तर अब छठे मन्त्रमें उस ध्यानकी स्थितिका वर्णन करके सातवेंमें मनुष्यको उस ध्यानमें लग जानेके लिये आदेश दिया जाता है—

अग्निर्वत्राभिमध्यते वायुर्वत्राधिरुध्यते ।

सोमो यत्रातिरिच्यते तत्र संजायते मनः ॥ ६ ॥

यत्र=जिस स्थितिमें; अग्निः=परमात्मारूप अग्निको; (प्राप्त करनेके उद्देश्यसे) अभिमध्यते=(ऊँकारके जप और ध्यानद्वारा) मन्थन किया जाता है; यत्र=जहाँ; वायुः अधिरुध्यते=प्राणवायुका भलीभाँति विधिपूर्वक निरोध किया जाता है; (तथा) यत्र=जहाँ; सोमः=आनन्दरूप सोमरस; अतिरिच्यते=अधिकतासे प्रकट होता है; तत्र=वहाँ (उस स्थितिमें); मनः=मन; संजायते=सर्वथा विशुद्ध हो जाता है ॥ ६ ॥

  • यह मन्त्र यजुर्वेद अध्याय ११का पाँचवाँ है और ऋग्वेद (१०।१३।१) में भी है।

अध्याय २ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

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व्याख्या —जिस स्थितिमें अग्नि प्रकट करनेके लिये अरणियोंद्वारा मन्थन करनेकी भाँति अग्निस्थानीय परमात्माको प्राप्त करनेके लिये पहले अध्याय (१३,१४ मन्त्र)में कहे हुए प्रकारसे शरीरको नीचेकी अरणि और ऊँकारको ऊपरकी अरणि बनाकर उसका जप और उसके अर्थरूप परमात्माका निरन्तर चिन्तनरूप मन्थन किया जाता है, जहाँ प्राणवायुका विधिपूर्वक भलीभाँति निरोध किया जाता है, जहाँ आनन्दरूप सोमरस अधिकतासे प्रकट होता है, उस ध्यानावस्थामें मनुष्यका मन सर्वथा विशुद्ध हो जाता है ॥६॥

सवित्रा प्रसवेन जुषेत ब्रह्म पूर्व्यम्। तत्र योनिं कृणवसे न हि ते पूर्वमक्षिपत् ॥७॥

सवित्रा =सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न करनेवाले परमात्माके द्वारा; प्रसवेन =प्राप्त हुई प्रेरणासे; पूर्व्यम् =सबके आदिकारण; ब्रह्म जुषेत =उस परब्रह्म परमेश्वरकी ही सेवा (आराधना) करनी चाहिये; (तू) तत्र =उस परमात्मामें ही; योनिम् =आश्रय; कृणवसे =प्राप्त कर; हि =क्योंकि; (यों करनेसे) ते =तेरे; पूर्व्यम् =पूर्वसंचित कर्म; न अक्षिपत् =विघ्नकारक नहीं होंगे ॥७॥

व्याख्या —हे साधक! सम्पूर्ण जगत्के उत्पादक सर्वान्तर््यामी परमेश्वरकी प्रेरणासे अर्थात् ऊपर बताये हुए प्रकारसे परमात्माकी स्तुति करके उनसे अनुमति प्राप्त कर तुम्हें उन सबके आदि परब्रह्म परमात्माकी ही सेवा (समाराधना) करनी चाहिये, उन परमेश्वरमें ही आश्रय प्राप्त करना चाहिये—उन्हींकी शरण ग्रहण करके उन्हींमें अपने-आपको विलीन कर देना चाहिये। यों करनेसे तुम्हारे पहले किये हुए समस्त संचित कर्म विघ्नकारक नहीं होंगे—बन्धनरूप नहीं होंगे ॥७॥

सम्बन्ध —ध्यानयोगका साधन करनेवालेको किस प्रकार बैठकर कैसे ध्यान करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं—

त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य। ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्वोत्तंसि सर्वाणि भयावहानि ॥८॥

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

विद्वान्=बुद्धिमान् मनुष्य (को चाहिये कि); त्रिरुत्रतम्=सिर, गला और छाती—ये तीनों अङ्ग ऊँचे उठाये हुए; शरीरम्=शरीरको; समम्=सीधा; (और) स्थाप्य=स्थिर करके; (तथा) इन्द्रियाणि=समस्त इन्द्रियोंको; मनसा=मनके द्वारा; हृदि=हृदयमें; सनिवेश्य=निरुद्ध करके; ब्रह्मोदुपेन=ॐकाररूप नौकाद्वारा; सर्वाणि=सम्पूर्ण; भयावहनि=भयंकर; स्रोतांसि=स्रोतों (प्रवाहों) को; प्रतरेत=पार कर जाय ॥ ८ ॥

व्याख्या —जो ध्यानयोगका साधन करे, उस बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि सिर, गले और छातीको ऊँचा उठाये रखे, इधर-उधर न झुकने दे तथा शरीरको सीधा और स्थिर रखे; क्योंकि शरीरको सीधा और स्थिर रखे बिना तथा सिर, गला और वक्षःस्थल ऊँचा किये बिना आलस्य, निद्रा और विश्लेषरूप विघ्न आ जाते हैं। अतः इन विघ्नोंसे बचनेके लिये उपर्युक्त प्रकारसे ही बैठना चाहिये। इसके बाद समस्त इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर उनका मनके द्वारा हृदयमें निरोध कर लेना चाहिये। फिर ॐकाररूप नौकाका आश्रय लेकर अर्थात् ॐकारका जप और उसके वाच्य परब्रह्म परमात्माका ध्यान करके समस्त भयानक प्रवाहोंको पार कर लेना चाहिये (गीता ६।१२, १३, १४)। भाव यह है कि नाना योनियोंमें ले जानेवाली जितनी वासनाएँ हैं, वे सब जन्म-मृत्युरूप भय देनेवाले स्रोत (प्रवाह) हैं। इन सबका त्याग करके सदाके लिये अमरपदको प्राप्त कर लेना चाहिये ॥ ८ ॥

प्राणान् प्रपीड्येह संयुक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छसीत। दुष्टाश्चयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान् मनो धारयेताप्रमत्तः ॥ ९ ॥

विद्वान्=बुद्धिमान् साधक (को चाहिये कि); इह=उपर्युक्त योगसाधनामें; संयुक्तचेष्टः=आहार-विहार आदि समस्त चेष्टाओंको यथायोग्य करते हुए; प्राणान् प्रपीड्य=विधिवत् प्राणायाम करके; प्राणे क्षीणे=प्राणके सूक्ष्म हो जानेपर; नासिकया=नासिकाद्वारा; उच्छसीत=उनको बाहर निकाल दे; दुष्टाश्चयुक्तम्=(इसके

अध्याय २ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

४५३

बाद) दुष्ट घोड़ोंसे युक्त; वाहम् इव =रथको जिस प्रकार सारथि सावधानतापूर्वक गन्तव्य मार्गमें ले जाता है, उसी प्रकार; एनम् =इस; मनः =मनको; अप्रमत्तः =सावधान होकर; धारयेत=वशमें किये रहे ॥१॥

व्याख्या —बुद्धिमान् साधकको चाहिये कि वह इस योग-साधनाके लिये आहार-विहार आदि समस्त चेष्टाओंको यथायोग्य करता रहे, उन्हें ध्यानयोगके लिये उपयोगी बना ले (गीता ६।१७)। योगशास्त्रकी विधिके अनुसार प्राणायाम करते-करते जब प्राण अत्यन्त सूक्ष्म हो जाय, तब नासिकाद्वारा उसे बाहर निकाल दे।* इसके बाद जैसे दुष्ट घोड़ोंसे जुते हुए रथको अच्छा सारथि बड़ी सावधानीसे चलाकर अपने गन्तव्य स्थानपर ले जाता है, उसी प्रकार साधकको चाहिये कि बड़ी सावधानीके साथ अपने मनको वशमें रखे, जिससे योगसाधनमें किसी प्रकारका विघ्न न आये और वह परमात्माकी प्रसिरूप लक्ष्यपर पहुँच जाय। ॥१॥

सम्बन्ध —परब्रह्म परमात्मामें मन लगानेके लिये कैसे स्थानमें कैसी भूमिपर बैठकर साधन करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहा जाता है—

समे शुचौ शर्करावह्निवालुका- विवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः। मनोऽनुकूले न तु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत् ॥१०॥

समे=समतल; शुचौ=सब प्रकारसे शुद्ध; शर्करावह्निवालुकाविवर्जिते=कंकड़, अग्नि और बालूसे रहित; (तथा) शब्दजलाश्रयादिभिः=शब्द, जल और आश्रय आदिकी दूषित; अनुकूले=सर्वथा अनुकूल; तु=और; न चक्षुपीडने=नेत्रोंको पीड़ा न देनेवाले; गुहानिवाताश्रयणे=गुहा आदि वायुयुक्त स्थानमें; मनः=मनको; प्रयोजयेत्=ध्यानमें लगानेका अभ्यास करना चाहिये ॥१०॥

  • आठवें और नवें मन्त्रोंमें जो ध्यानके लिये बैठनेकी और साधन करनेकी विधि बतायी गयी है, उसका बड़े सुन्दर ढंगसे सुस्पष्ट वर्णन भगवान्ने गीता अध्याय ६ श्लोक ११से १७ तक किया है।

† कठोपनिषद्में (१।३।२ से ८ तक) रथके रूपकका विस्तृत वर्णन है।

४५४

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

व्याख्या —इस मन्त्रमें ध्यानयोगके उपयुक्त स्थानका वर्णन है। भाव यह है कि ध्यानयोगका साधन करनेवाले साधकको ऐसे स्थानमें अपना आसन लगाना चाहिये, जहाँकी भूमि समतल हो—ऊँची-नीची, टेढ़ी-मेढ़ी न हो, जो सब प्रकारसे शुद्ध हो—जहाँपर कूड़ा-करकट, मैला आदि न हो, झाड़-बुहारकर साफ किया हुआ हो और स्वभावसे भी पवित्र हो—जैसे कोई देवालय, तीर्थस्थान आदि; जहाँ कंकड़, बालू न हो और अग्नि या धूपकी गर्मी भी न हो; जहाँ कोई मनमें विशेष करनेवाला शब्द न होता हो—कोलाहलका सर्वथा अभाव हो; यथावश्यक जल प्राप्त हो सके; किंतु ऐसा जलाशय न हो, जहाँ बहुत लोग आते-जाते हों एवं जहाँ शरीर-रक्षाके लिये उपयुक्त आश्रय हो, परंतु ऐसा न हो, जहाँ धर्मशाला आदिकी भाँति बहुत लोग ठहरते हों; तात्पर्य यह कि इन सब विचारोंके अनुसार जो सर्वथा अनुकूल हो और जहाँका दृश्य नेत्रोंको पीड़ा पहुँचानेवाला—भयानक न हो, ऐसे गुफा आदि वायुशून्य एकांत स्थानमें पहले बताये हुए प्रकारसे आसन लगाकर अपने मनको परमात्मामें लगानेका अभ्यास करना चाहिये (गीता ६।११) ॥१०॥

सम्बन्ध —योगाभ्यास करनेवाले साधकका साधन ठीक हो रहा है या नहीं, इसकी पहचान बतायी जाती है—

नीहारधूमाकर्निलानलानां

खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् ।

एतानि रूपाणि पुरःसराणि

ब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगे ॥ ११ ॥

ब्रह्मणि योगे =परमात्माकी प्राप्तिके लिये किये जानेवाले योगमें; (पहले) नीहारधूमाकर्निलानलानाम् =कुहरा, धूआँ, सूर्य, वायु और अग्निके सद्गुण; (तथा) खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् =जुगनू, बिजली, स्फटिक-मणि और चन्द्रमाके सद्गुण; रूपाणि =बहुत-से दृश्य; पुरःसराणि [ भवन्ति ]=योगीके सामने प्रकट होते हैं; एतानि =ये सब; अभिव्यक्तिकराणि =योगकी सफलताको स्पष्टरूपसे सूचित करनेवाले हैं ॥ ११ ॥

अध्याय २ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

४५५

व्याख्या —जब साधक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये ध्यानयोगका साधन आरम्भ करता है, तब उसको अपने सामने कभी कुहरेके सदृश रूप दीखता है, कभी धूआँ-सा दिखायी देता है, कभी सूर्यके समान प्रकाश सर्वत्र परिपूर्ण दीखता है, कभी निश्चल वायुकी भाँति निराकार रूप अनुभवमें आता है, कभी अग्निके सदृश तेज दीख पड़ता है, कभी जुगनूके सदृश टिमटिमाहट-सी प्रतीत होती है, कभी बिजलीकी-सी चकाचौंध पैदा करनेवाली दीसि दृष्टिगोचर होती है, कभी स्फटिक-मणिके सदृश उज्ज्वल रूप देखनेमें आता है और कभी चन्द्रमाकी भाँति शीतल प्रकाश सर्वत्र फैला हुआ दिखायी देता है। ये सब तथा और भी अनेक दृश्य योग-साधनकी उन्नतिके द्योतक हैं। इनसे यह बात समझमें आती है कि साधकका ध्यान ठीक हो रहा है ॥ ११ ॥

पृथ्व्यसेजोऽनिलखे

समुत्थिते

पञ्चात्मके

योगगुणे

प्रवृत्ते ।

न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः

प्रासस्य

योगाग्रिमयं

शरीरम् ॥ १२ ॥

पृथ्व्यसेजोऽनिलखे समुत्थिते =पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँचों महाभूतोंका सम्यक् प्रकारसे उत्थान होनेपर; (तथा) पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते =इनसे सम्बन्ध रखनेवाले पाँच प्रकारके योगसम्बन्धी गुणोंकी सिद्धि हो जानेपर; योगाग्रिमयम् =योगाग्रिमय; शरीरम् =शरीरको; प्रासस्य =प्रास कर लेनेवाले; तस्य =उस साधकको; =न तो; रोगः =रोग होता है; =न; जरा =बुढ़ापा आता है; =और न; मृत्युः =उसकी मृत्यु ही होती है ॥ १२ ॥

व्याख्या —ध्यानयोगका साधन करते-करते जब पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँच महाभूतोंका उत्थान हो जाता है, अर्थात् जब साधकका इन पाँचों महाभूतोंपर अधिकार हो जाता है और इन पाँचों महाभूतोंसे सम्बन्ध रखनेवाली योगविषयक पाँचों सिद्धियाँ प्रकट हो जाती हैं, उस समय योगाग्रिमय शरीरको प्रास कर लेनेवाले उस योगीके शरीरमें न तो रोग होता है, न बुढ़ापा

४५६

ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय २ ]

आता है और न उसकी मृत्यु ही होती है। अभिप्राय यह कि उसकी इच्छाके बिना उसका शरीर नष्ट नहीं हो सकता (योगद० ३। ४६, ४७) ॥ १२ ॥

लघुत्वमारोग्यमलोलुप्तत्वं

| वर्णप्रसादं | स्वरसौष्ठवं | च। ---|---|---|--- गन्धः | शुभो | मूत्रपुरीषमल्पं | | योगप्रवृत्तिं | प्रथमां | वदन्ति ॥ १३ ॥

लघुत्वम्=शरीरका हल्कापन; आरोग्यम्=किसी प्रकारके रोगका न होना; अलोलुप्तत्वम्=विषयासक्तिकी निवृत्ति; वर्णप्रसादम्=शारीरिक वर्णकी उज्ज्वलता; स्वरसौष्ठवम्=स्वरकी मधुरता; शुभः गन्धः=(शरीरमें) अच्छी गन्ध; च=और; मूत्रपुरीषम्=मल-मूत्र; अल्पम्=कम हो जाना; (इन सबको) प्रथमाम् योगप्रवृत्तिम्=योगकी पहली सिद्धि; वदन्ति=कहते हैं ॥ १३ ॥

व्याख्या—भूतोंपर विजय प्राप्त कर लेनेवाले ध्यानयोगीमें पूर्वोक्त शक्तियोंके सिवा और भी शक्तियाँ आ जाती हैं। उदाहरणतः उसका शरीर हल्का हो जाता है, शरीरमें भारीपन या आलस्यका भाव नहीं रहता। वह सदा ही नीरोग रहता है, उसे कभी कोई रोग नहीं होता। भौतिक पदार्थोंमें उसकी आसक्ति नष्ट हो जाती है। कोई भी भौतिक पदार्थ सामने आनेपर उसके मन और इन्द्रियोंका उसकी ओर आकर्षण नहीं होता। उसके शरीरका वर्ण उज्ज्वल हो जाता है। स्वर अत्यन्त मधुर और स्पष्ट हो जाता है। शरीरमेंसे बहुत अच्छी गन्ध निकलकर सब ओर फैल जाती है। मल और मूत्र बहुत ही स्वल्प मात्रामें होने लगते हैं। ये सब योगमार्गकी प्रारम्भिक सिद्धियाँ हैं—ऐसा योगीलोग कहते हैं ॥ १३ ॥

यथैव | विम्बं | मृदयोपलिप्तं | ---|---|---|--- | तेजोमयं | भ्राजते | तत् सुधान्तम्। तद्वाऽऽत्मतत्त्वं | प्रसमीक्ष्य | देही | | एकः | कृतार्थो भवते | वीतशोकः ॥ १४ ॥

यथा=जिस प्रकार; मृदया=मिट्टीसे; उपलिप्तम्=लिस होकर मलिन हुआ;