ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 438, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
पृथ्वी—ये आठ सूक्ष्म तत्त्व और इनके ही आठ स्थूल रूप—इस प्रकार सोलह सिर हैं। जिस प्रकार चक्रमें अरे लगे रहते हैं, जो एक ओरसे नेमिके टुकड़ोंमें जुड़े रहते हैं और दूसरी ओरसे चक्केकी नाभिमें जुड़े होते हैं, उसी प्रकार इस संसारचक्रमें अन्तःकरणकी वृत्तियोंके पचास भेद तो पचास अरोंकी जगह हैं और पाँच महाभूतोंके कार्य—दस इन्द्रियाँ, पाँच विषय और पाँच प्राण—ये बीस सहायक अरोंकी जगह हैं। इस चक्केमें आठ-आठ चीजोंके* छः समूह अङ्गरूपमें विद्यमान हैं। इन्हींको छः अष्टकोंके नामसे कहा गया है। जीवोंको इस चक्रमें बाँधकर रखनेवाली अनेक रूपोंमें प्रकट आसक्तिरूप एक फाँसी है। देवयान, पितृयान और इसी लोकमें एक योनिसे दूसरी योनिमें जानेका मार्ग—इस प्रकार ये तीन मार्ग हैं। पुण्यकर्म और पापकर्म—ये दो इस जीवको इस चक्रके साथ-साथ घुमानेमें निमित्त हैं और जिसमें अरे टेंगि रहते हैं, उस
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यहाँ ‘अष्टक’ शब्दसे क्या अभिप्राय है, ठीक-ठीक पता नहीं चलता। चक्रोंमें भी ‘अष्टक’ नामका कोई अङ्ग होता है या नहीं और यदि होता है तो उसका क्या स्वरूप होता है तथा उसे अष्टक क्यों कहते हैं—इसका भी कोई पता नहीं चलता। शाङ्करभाष्यमें भी ‘अष्टक’ किसे कहते हैं—यह खोलकर नहीं बताया गया। इसीलिये छः अष्टकोंकी व्याख्या नहीं की जा सकती। शाङ्करभाष्यके अनुसार छः अष्टक इस प्रकार हैं—
- (१) गीता (७।४) में उल्लिखित आठ प्रकारकी प्रकृति अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार;
- (२) शरीरगत आठ धातुएँ अर्थात् त्वचा, चमड़ी, मांस, रक्त, मेद, हड्डी, मज्जा और वीर्य;
- (३) अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाग्न्य, ईशित्व और वशित्व—ये आठ प्रकारके ऐश्वर्य;
- (४) धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य (राग) और अनेश्वर्य—ये आठ भाव;
- (५) ब्रह्मा, प्रजापति, देव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितर और पिशाच—ये आठ प्रकारकी देवयोनियाँ;
(६) समस्त प्राणियोंके प्रति दया, क्षमा, अनसूया (निन्दा न करना) शौच (बाहर भीतरकी पवित्रता), अनायास, मङ्गल, अकृपणता (उदारता) और अस्मृता—ये आत्माके आठ गुण;