भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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अध्याय १ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

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उस शक्तिके किसी एक अंशको लेकर अपने-अपने कार्यकि करनेमें समर्थ होते हैं, वे एक सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ही इस जगत्के वास्तविक कारण हैं, दूसरा कोई नहीं है ॥ ३ ॥

तमेकनेमिंत्रिवृत्तंषोडशान्तं
शताधारंविंशतिप्रत्यराभिः ।
अष्टकैःषड्भिर्विश्वरूपैकपाशं
त्रिमार्गभेदंद्विनिमित्तैकमोहम् ॥ ४ ॥

तम्=उस; एकनेमिम्=एक नेमिवाले; त्रिवृत्तम्=तीन घेरोंवाले; षोडशान्तम्=सोलह सिरोंवाले; शताधारम्=पचास अरोंवाले; विंशतिप्रत्यराभिः=बीस सहायक अरोंसे; (तथा) षड्भिः अष्टकैः=छः अष्टकोंसे; [ युक्तम् ]=युक्त; विश्वरूपैकपाशम्=अनेक रूपोंवाले एक ही पाशसे युक्त; त्रिमार्गभेदम्=मार्गके तीन भेदोंवाले; (तथा) द्विनिमित्तैकमोहम्=दो निमित्त और मोहरूपी एक नाभिवाले (चक्रको); [ अपश्यन् ]=उन्होंने देखा ॥ ४ ॥

व्याख्या—इस मन्त्रमें विश्वका चक्रके रूपमें वर्णन किया गया है। भाव यह कि परमदेव परमेश्वरकी स्वरूपभूता अचिन्त्यशक्तिका दर्शन करनेवाले वे ऋषिलोग कहते हैं—हमने एक ऐसे चक्रको देखा है, जिसमें एक नेमि है। नेमि उस गोल घेरेको कहते हैं, जो चक्रके अरों और नाभि आदि सब अवयवोंको वेष्टित किये रहती है तथा यथास्थान बनाये रखती है। यहाँ अव्याकृत प्रकृतिको ही 'नेमि' कहा गया है; क्योंकि वही इस व्यक्त जगत्का मूल अथवा आधार है। जिस प्रकार चक्केकी रक्षाके लिये उस नेमिके ऊपर लोहेका घेरा (हाल) चढ़ा रहता है, उसी प्रकार इस संसारचक्रकी अव्याकृत-प्रकृतिरूप नेमिके ऊपर सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण ही तीन घेरे हैं। यह पहले ही कह आये हैं कि भगवान्की वह अचिन्त्यशक्ति तीन गुणोंसे ढकी है। जिस प्रकार चक्केकी नेमि अलग-अलग सिरोंके जोड़से बनती है, उसी प्रकार संसाररूप चक्रकी प्रकृतिरूप नेमिके मन, बुद्धि और अहंकार तथा आकाश, वायु, तेज, जल और