ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 436, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय १ ]
होती है, वह उसके संचालक चेतन आत्माके ही अधीन और उसीके भोगार्थ होती है। इनके सिवा पुरुष अर्थात् जीवात्मा भी जगत्का कारण नहीं हो सकता; क्योंकि वह सुख-दुःखके हेतुभूत प्रारब्धके अधीन है, वह भी स्वतन्त्ररूपसे कुछ नहीं कर सकता। अतः कारण-तत्त्व कुछ और ही है ॥ २ ॥
सम्बन्ध —इस प्रकार विचार करके उन्होंने क्या निर्णय किया, इस जिज्ञासापर कहा जाता है—
| ते | ध्यानयोगानुगता | अपश्यन् |
|---|---|---|
| देवात्मशक्तिं | स्वगुणैर्निगूढाम् । | |
| यः | कारणानि निखिलानि तानि | |
| कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः | ॥ ३ ॥ |
ते=उन्होंने; ध्यानयोगानुगता:=ध्यानयोगमें स्थित होकर; स्वगुणैः=अपने गुणोंसे; निगूढाम्=ढकी हुई; देवात्मशक्तिम् अपश्यन्=(उन) परमात्मदेवकी स्वरूपभूत अचिन्त्यशक्तिका साक्षात्कार किया; यः=जो (परमात्मदेव); एकः=अकेला ही; तानि=उन; कालात्मयुक्तानि=कालसे लेकर आत्मातक (पहले बताये हुए); निखिलानि=सम्पूर्ण; कारणानि अधितिष्ठति=कारणोंपर शासन करता है ॥ ३ ॥
व्याख्या —इस प्रकार आपसमें विचार करनेपर जब युक्तियोंद्वारा और अनुमानसे वे किसी निर्णयपर नहीं पहुँच सके, तब वे सब ध्यानयोगमें स्थित हो गये अर्थात् अपने मन और इन्द्रियोंको बाहरके विषयोंसे हटाकर परब्रह्मको जाननेके लिये उन्हींका चिन्तन करनेमें तत्पर हो गये। ध्यान करते-करते उन्हें परमात्माकी महिमाका अनुभव हुआ। उन्होंने उन परमदेव परब्रह्म पुरुषोत्तमकी स्वरूपभूत अचिन्त्य दिव्य शक्तिका साक्षात्कार किया, जो अपने ही गुणोंसे—सत्त्व, रज, तमसे ढकी है, अर्थात् जो देखनेमें त्रिगुणमयी प्रतीत होती है, परंतु वास्तवमें तीनों गुणोंसे परे है। तब वे इस निर्णयपर पहुँचे कि कालसे लेकर आत्मातक जितने कारण पहले बताये गये हैं, उन समस्त कारणोंके जो अधिष्ठाता—स्वामी हैं, अर्थात् वे सब जिनकी आज्ञा और प्रेरणा पाकर, जिनकी