ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 435, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
४३३
संयोग एषां न त्वात्मभावा- दात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः ॥ २ ॥
(क्या) कालः=काल; स्वभावः=स्वभाव; नियतिः=निश्चित फल देनेवाला कर्म; यदृच्छा=आकस्मिक घटना; भूतानि=पाँचों महाभूत; (या) पुरुषः=जीवात्मा; योनिः=कारण है; इति चिन्त्या=इसपर विचार करना चाहिये; एषाम्=इन काल आदिका; संयोगः=समुदाय; तु-भी; न=इस जगत्का कारण नहीं हो सकता; आत्मभावात्=क्योंकि वे चेतन आत्माके अधीन हैं (जड़ होनेके कारण स्वतन्त्र नहीं हैं); आत्मा=जीवात्मा; अपि=भी; [ न ]=इस जगत्का कारण नहीं हो सकता; सुखदुःखहेतोः=(क्योंकि वह) सुख-दुःखोंके हेतुभूत प्रारब्धके; अनीशः=अधीन है, स्वतन्त्र नहीं है ॥ २ ॥
व्याख्या—वे कहने लगे कि वेद-शास्त्रोंमें अनेक कारणोंका वर्णन आता है। कहीं तो कालको कारण बताया है; क्योंकि किसी-न-किसी समयपर ही वस्तुओंकी उत्पत्ति देखी जाती है, जगत्की रचना और प्रलय भी कालके ही अधीन सुने जाते हैं। कहीं स्वभावको कारण बताया जाता है; क्योंकि बीजके अनुरूप ही वृक्षकी उत्पत्ति होती है—जिस वस्तुमें जो स्वाभाविक शक्ति है, उसीसे उसका कार्य उत्पन्न होता देखा जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि वस्तुगत शक्तिरूप जो स्वभाव है, वह कारण है। कहीं कर्मको कारण बताया है; क्योंकि कर्मानुसार ही जीव भिन्न-भिन्न योनियोंमें भिन्न-भिन्न स्वभाव आदिसे युक्त होकर उत्पन्न होते हैं। कहीं आकस्मिक घटनाको अर्थात् होनहार (भवितव्यता)-को कारण बताया है। कहीं पाँचों महाभूतोंको और कहीं जीवात्माको जगत्का कारण बताया गया है। अतः हमलोगोंको विचार करना चाहिये कि वास्तवमें कारण कौन है। विचार करनेसे समझमें आता है कि कालसे लेकर पञ्चमहाभूतोंतक बताये हुए जड़ पदार्थोंमेंसे कोई भी जगत्का कारण नहीं है। वे अलग-अलग तो क्या, सब मिलकर भी जगत्के कारण नहीं हो सकते; क्योंकि ये सब जड़ होनेके कारण चेतनके अधीन हैं, इसमें स्वतन्त्र कार्य करनेकी शक्ति नहीं है। जिन जड़ वस्तुओंके मेलसे कोई नयी चीज उत्पन्न