ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 431, कुल 548 में से
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तैत्तिरीयोपनिषद्
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देवेभ्यः=देवताओंसे भी; पूर्वम्=पहले विद्यमान; अमृतस्य=अमृतका; नाभाधि (नाभि)=केन्द्र; अस्मि=हूँ; यः=जो कोई; मा=मुझे; ददाति=देता है; सः=वह; इत्=इस कार्यसे; एव=ही; मा आवाः=मेरी रक्षा करता है; अहम्=मैं; अन्नम्=अन्नस्वरूप होकर; अन्नम्=अन्न; अदन्तम्=खानेवालेको; अच्चि=निगल जाता हूँ; अहम्=मैं; विश्वम्=समस्त; भुवनम् अभ्यभवाम्=ब्रह्माण्डका तिरस्कार करता हूँ; सुवः न ज्योतिः=मेरे प्रकाशकी एक झलक सूर्यके समान है; यः=जो; एवम्=इस प्रकार; वेद=जानता है (उसे भी यही स्थिति प्राप्त होती है); इति=इस प्रकार; उपनिषत्=यह उपनिषद्—ब्रह्मविद्या समाप्त हुई।
व्याख्या —उस महापुरुषकी स्थिति शरीरमें नहीं रहती। वह शरीरसे सर्वथा ऊपर उठकर परमात्माको प्राप्त हो जाता है। यह बात पहले कहकर उसके बाद इस साम-गानका वर्णन किया गया है। इससे यह प्रकट होता है कि परमात्माके साथ एकताकी प्राप्ति कर लेनेवाले महापुरुषके ये पावन उद्धार उसके विशुद्ध अन्तःकरणसे निकले हैं और उसकी अलौकिक महिमा सूचित करते हैं। 'हावु' पद आश्चर्यबोधक अव्यय है। वह महापुरुष कहता है—बड़े आश्चर्यकी बात है! वे सम्पूर्ण भोग-वस्तुएँ, इनको भोगनेवाला जीवात्मा और इन दोनोंका संयोग करानेवाला परमेश्वर एक मैं ही हूँ। मैं ही इस प्रत्यक्ष दीखनेवाले जगत्में समस्त देवताओंसे पहले सबमें प्रधान होकर प्रकट होनेवाला ब्रह्म हूँ; और परमानन्दरूप अमृतके केन्द्र परब्रह्म परमेश्वर भी मुझसे अभिन्न हैं, अतः वे भी मैं ही हूँ। जो कोई मनुष्य किसी भी वस्तुके रूपमें मुझे किसीको प्रदान करता है, वह मानो मुझे देकर मेरी रक्षा करता है। अर्थात् योग्य पात्रमें भोग्य पदार्थोंका दान ही उनकी रक्षाका सर्वोत्तम उपाय है। इसके विपरीत जो अपने ही लिये अन्नरूप समस्त भोगोंका उपभोग करता है, उस खानेवालेको मैं अन्नरूप होकर निगल जाता हूँ। अर्थात् उसका विनाश हो जाता है—उसकी भोग-सामग्री टिकती नहीं। मैं समस्त ब्रह्माण्डका तिरस्कार करनेवाला हूँ। मेरी महिमाकी तुलनामें यह सब तुच्छ है। मेरे प्रकाशकी एक झलक भी सूर्यके समान है। अर्थात् जगत्में जितने भी प्रकाशयुक्त पदार्थ