ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished548 पृष्ठ
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ वल्ली ३ ]
हैं, वे सब मेरे ही तेजके अंश हैं। जो कोई इस प्रकार परमात्माके तत्त्वको जानता है, वह भी इसी स्थितिको प्राप्त कर लेता है। उपर्युक्त कथन परमात्मामें एकीभावसे स्थित होकर परमात्माकी दृष्टिसे है, यह समझना चाहिये।
॥ दशम अनुवाक समाप्त ॥ १० ॥
॥ भृगुवल्ली समाप्त ॥ ३ ॥
॥ कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीयोपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ
ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः। शं नो भवत्यर्चमा। शं न इन्द्रो बृहस्पतिः। शं नो विष्णुरुरुक्रमः।* नमो ब्रह्मणे। नमस्ते वायो। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादिषम्। ऋतमवादिषम्। सत्यमवादिषम्। तन्मामावीत्। तद्वक्तारमावीत्। आवीन्माम्। आवीद्वक्तारम्॥
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!
इसका अर्थ शीक्षावल्लीके द्वादश अनुवाकमें दिया गया है।
- यह मन्त्र ऋग्वेद १।१०।९, यजुर्वेद ३६।९ में आया है।