ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 49, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
केनोपनिषद्
यह उपनिषद् सामवेदके 'तलवकार ब्राह्मण' के अन्तर्गत है। तलवकारको जैमिनीय-उपनिषद् भी कहते हैं। 'तलवकार ब्राह्मण' के अस्तित्वके सम्बन्धमें कुछ पाश्चात्त्य विद्वानोंको संदेह हो गया था, परंतु डॉ० बर्नेलको कहींसे एक प्राचीन प्रति मिल गयी, तबसे वह संदेह जाता रहा। इस उपनिषद्में सबसे पहले 'केन' शब्द आया है, इसीसे इसका 'केनोपनिषद्' नाम पड़ गया। इसे 'तलवकार-उपनिषद्' और 'ब्राह्मणोपनिषद्' भी कहते हैं। तलवकार ब्राह्मणका यह नवम अध्याय है। इसके पूर्वके आठ अध्यायोंमें अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये विभिन्न कर्म और उपासनाओंका वर्णन है। इस उपनिषद्का प्रतिपाद्य विषय परब्रह्म-तत्त्व बहुत ही गहन है, अतएव उसको भलीभाँति समझानेके लिये गुरु-शिष्य-संवादके रूपमें तत्त्वका विवेचन किया गया है।
शान्तिपाठ
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि। सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत्, अनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु। तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु, ते मयि सन्तु॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
ॐ=हे परब्रह्म परमात्मन्; मम=मेरे; अङ्गानि=सम्पूर्ण अङ्ग; वाक्=वाणी; प्राणः=प्राण; चक्षुः=नेत्र; श्रोत्रम्=कान; च=और; सर्वाणि=सब; इन्द्रियाणि=इन्द्रियाँ; अथो=तथा; बलम्=शक्ति; आप्यायन्तु=परिपुष्ट हों; सर्वम्=(यह जो) सर्वरूप; औपनिषदम्=उपनिषत्-प्रतिपादित; ब्रह्म=ब्रह्म है; अहम्=मैं; ब्रह्म=इस ब्रह्मको; मा निराकुर्याम्=अस्वीकार न करूँ; (और) ब्रह्म=ब्रह्म; मा=मुझको; मा