ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 50, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ खण्ड १ ]
निराकरोत्=परित्याग न करे; अनिराकरणम्=(उसके साथ मेरा) अटूट सम्बन्ध; अस्तु=हो; मे=मेरे साथ; अनिराकरणम्=(उसका) अटूट सम्बन्ध; अस्तु=हो; उपनिषत्सु=उपनिषदोंमें प्रतिपादित; ये=जो; धर्माः=धर्मसमूह हैं; ते=वे सब; तदात्मनि=उस परमात्ममें; निरते=लगे हुए; मयि=मुझमें; सन्तु=हों; ते=वे सब; मयि=मुझमें; सन्तु=हों। ॐ=हे परमात्मन्; शान्तिः शान्तिः शान्तिः=त्रिविध तापोंकी निवृत्ति हो।
व्याख्या —हे परमात्मन् ! मेरे सारे अङ्ग, वाणी, नेत्र, श्रोत्र आदि सभी कर्मन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ, प्राणसमूह, शारीरिक और मानसिक शक्ति तथा ओज—सब पुष्टि एवं वृद्धिको प्राप्त हों। उपनिषदोंमें सर्वरूप ब्रह्मका जो स्वरूप वर्णित है, उसे मैं कभी अस्वीकार न करूँ और वह ब्रह्म भी मेरा कभी परित्याग न करे। मुझे सदा अपनाये रखे। मेरे साथ ब्रह्मका और ब्रह्मके साथ मेरा नित्य सम्बन्ध बना रहे। उपनिषदोंमें जिन धर्मोंका प्रतिपादन किया गया है, वे सारे धर्म, उपनिषदोंके एकमात्र लक्ष्य परब्रह्म परमात्मामें निरन्तर लगे हुए मुझ साथकमें सदा प्रकाशित रहें, मुझमें नित्य-निरन्तर बने रहें। और मेरे त्रिविध तापोंकी निवृत्ति हो।
प्रथम खण्ड
सम्बन्ध—शिव्य गुरुदेवसे पूछता है—
ॐ केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः ।
केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥ १ ॥
केन=किसके द्वारा; इषितम्=सत्तापूर्ति पाकर; (और) प्रेषितम्=प्रेरित—संचालित होकर; (यह) मनः=मन (अन्तःकरण); पतति=अपने विषयोंमें गिरता है—उनतक पहुँचता है; केन=किसके द्वारा; युक्तः=नियुक्त होकर; प्रथमः=अन्य सबसे श्रेष्ठ; प्राणः=प्राण; प्रैति=चलता है; केन=किसके द्वारा; इषिताम्=क्रियाशील की हुई; इमाम्=इस; वाचम्=वाणीको; वदन्ति=लोग बोलते हैं; कः=(और) कौन;