भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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खण्ड १ ] केनोपनिषद् ४१

उ=प्रसिद्ध; देवः=देव; चक्षुः=नेत्रेन्द्रिय (और); श्रोत्रम्=कर्णेन्द्रियको; युनक्ति=नियुक्त करता है (अपने-अपने विषयोंके अनुभवमें लगाता है) ॥ १ ॥

**व्याख्या—**इस मन्त्रमें चार प्रश्न हैं। इनमें प्रकारान्तरसे यह पूछा गया है कि जडरूप अन्तःकरण, प्राण, वाणी आदि कर्मेन्द्रियों और चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियोंको अपना-अपना कार्य करनेकी योग्यता प्रदान करनेवाला और उन्हें अपने-अपने कार्यमें प्रवृत्त करनेवाला जो कोई एक सर्वशक्तिमान् चेतन है, वह कौन है? और कैसा है?॥ १॥

**सम्बन्ध—**इसके उत्तरमें गुरु कहते हैं—

श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वाचो ह वाच ँ स उ प्राणस्य प्राणः।
चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ २ ॥

यत्=जो; मनसः=मनका; मनः=मन अर्थात् कारण है; प्राणस्य=प्राणका; प्राणः=प्राण है; वाचः=वाक् इन्द्रियका; वाचम्=वाक् है; श्रोत्रस्य=श्रोत्रेन्द्रियका; श्रोत्रम्=श्रोत्र है; =और; चक्षुषः=चक्षु इन्द्रियका; चक्षुः=चक्षु है; सः=वह; =ही (इन सबका प्रेरक परमात्मा है); धीराः=ज्ञानीजन (उसे जानकर); अतिमुच्य=जीवन्मुक्त होकर; अस्मात्=इस; लोकात्=लोकसे; प्रेत्य=जानेके बाद (मृत्युके अनन्तर); अमृताः=अमर (जन्म-मृत्युसे रहित); भवन्ति=हो जाते हैं॥ २॥

**व्याख्या—**इस मन्त्रमें गुरु शिष्यके प्रश्नोंका स्पष्ट उत्तर न देकर 'जो श्रोत्रका भी श्रोत्र है' इत्यादि शब्दोंके द्वारा संकेतसे समझा रहे हैं कि जो इन मन, प्राण और सम्पूर्ण इन्द्रियोंका—समस्त जगत्का परम कारण है, जिससे ये सब उत्पन्न हुए हैं, जिसकी शक्तिको पाकर ये सब अपना-अपना कार्य करनेमें समर्थ हो रहे हैं और जो इन सबको जाननेवाला है, वह परब्रह्म पुरुषोत्तम ही इन सबका प्रेरक है। उसे जानकर ज्ञानीजन जीवन्मुक्त होकर इस लोकसे प्रयाण करनेके अनन्तर अमृतस्वरूप—विदेहमुक्त हो जाते हैं अर्थात् जन्म-मृत्युसे सदाके लिये छूट जाते हैं॥ २॥