ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 52, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ खण्ड १ ]
सम्बन्ध— वह मन, प्राण और इन्द्रियोंका प्रेरक ब्रह्म ‘ऐसा’ है—इस प्रकार स्पष्ट न कहकर संकेतसे ही क्यों समझाया?—इस जिज्ञासापर पुनः गुरु कहते हैं—
न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो न विद्यो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यादन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि । इति शृश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे ॥ ३ ॥
तत्र=वहाँ (उस ब्रह्मतक); न=न तो; चक्षुः=चक्षु-इन्द्रिय (आदि सब ज्ञानेन्द्रियाँ); गच्छति=पहुँच सकती हैं; न=न; वाक्=वाक्-इन्द्रिय (आदि कर्मेन्द्रियाँ); गच्छति=पहुँच सकती हैं; (और) नो=न; मनः=मन (अन्तःकरण) ही; (अतः) यथा=जिस प्रकार; एतत्=इस (ब्रह्मके स्वरूप) को; अनुशिष्यात्=बतलाया जाय कि वह ऐसा है; न विद्याः=(इस बातको) न तो हम स्वयं अपनी बुद्धिसे जानते हैं; (और) न विजानीमः=न दूसरोंसे सुनकर ही जानते हैं; (क्योंकि) तत्=वह; विदितात्=जाने हुए (जाननेमें आनेवाले) पदार्थसमुदायसे; अन्यत् एव=भित्र ही है; अथो=और; अविदितात्=(मन-इन्द्रियोंद्वारा) न जाने हुए (जाननेमें न आनेवाले) से (भी); अधि=ऊपर है; इति=यह; पूर्वेषाम्=अपने पूर्वार्चार्याके मुखसे; शृश्रुम=सुनते आये हैं; ये=जिन्होंने; नः=हमें; तत्=उस ब्रह्माका तत्त्व; व्याचचक्षिरे=भलीभाँति व्याख्या करके समझाया था ॥ ३ ॥
व्याख्या—उन सच्चिदानन्दधन परब्रह्मको प्राकृत अन्तःकरण और इन्द्रियाँ नहीं जान सकतीं। ये वहाँतक पहुँच ही नहीं पातीं। उस अलौकिक दिव्य तत्त्वमें इनका प्रवेश ही नहीं हो सकता। बल्कि इनमें जो चेतना और क्रिया प्रतीत होती है, यह उसी ब्रह्मकी प्रेरणासे और उसीकी शक्तिसे होती है। ऐसी अवस्थामें मन-इन्द्रियोंके द्वारा कोई कैसे बतलाये कि वह ब्रह्म ‘ऐसा है’। इस प्रकार ब्रह्मतत्त्वके उपदेशका कोई तरीका न तो हमने किसीके भी द्वारा समझा है और न हम स्वयं अपनी बुद्धिसे ही विचारके द्वारा समझ रहे हैं। हमने तो जिन महापुरुषोंसे इस गूढ़ तत्त्वका उपदेश प्राप्त किया है, उनसे यही सुना है कि वह परब्रह्म परमेश्वर जड-चेतन दोनोंसे ही भिन्न है—जाननेमें आनेवाले सम्पूर्ण दृश्य