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ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ खण्ड १ ]

सम्बन्ध— वह मन, प्राण और इन्द्रियोंका प्रेरक ब्रह्म ‘ऐसा’ है—इस प्रकार स्पष्ट न कहकर संकेतसे ही क्यों समझाया?—इस जिज्ञासापर पुनः गुरु कहते हैं—

न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो न विद्यो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यादन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि । इति शृश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे ॥ ३ ॥

तत्र=वहाँ (उस ब्रह्मतक); न=न तो; चक्षुः=चक्षु-इन्द्रिय (आदि सब ज्ञानेन्द्रियाँ); गच्छति=पहुँच सकती हैं; न=न; वाक्=वाक्-इन्द्रिय (आदि कर्मेन्द्रियाँ); गच्छति=पहुँच सकती हैं; (और) नो=न; मनः=मन (अन्तःकरण) ही; (अतः) यथा=जिस प्रकार; एतत्=इस (ब्रह्मके स्वरूप) को; अनुशिष्यात्=बतलाया जाय कि वह ऐसा है; न विद्याः=(इस बातको) न तो हम स्वयं अपनी बुद्धिसे जानते हैं; (और) न विजानीमः=न दूसरोंसे सुनकर ही जानते हैं; (क्योंकि) तत्=वह; विदितात्=जाने हुए (जाननेमें आनेवाले) पदार्थसमुदायसे; अन्यत् एव=भित्र ही है; अथो=और; अविदितात्=(मन-इन्द्रियोंद्वारा) न जाने हुए (जाननेमें न आनेवाले) से (भी); अधि=ऊपर है; इति=यह; पूर्वेषाम्=अपने पूर्वार्चार्याके मुखसे; शृश्रुम=सुनते आये हैं; ये=जिन्होंने; नः=हमें; तत्=उस ब्रह्माका तत्त्व; व्याचचक्षिरे=भलीभाँति व्याख्या करके समझाया था ॥ ३ ॥

व्याख्या—उन सच्चिदानन्दधन परब्रह्मको प्राकृत अन्तःकरण और इन्द्रियाँ नहीं जान सकतीं। ये वहाँतक पहुँच ही नहीं पातीं। उस अलौकिक दिव्य तत्त्वमें इनका प्रवेश ही नहीं हो सकता। बल्कि इनमें जो चेतना और क्रिया प्रतीत होती है, यह उसी ब्रह्मकी प्रेरणासे और उसीकी शक्तिसे होती है। ऐसी अवस्थामें मन-इन्द्रियोंके द्वारा कोई कैसे बतलाये कि वह ब्रह्म ‘ऐसा है’। इस प्रकार ब्रह्मतत्त्वके उपदेशका कोई तरीका न तो हमने किसीके भी द्वारा समझा है और न हम स्वयं अपनी बुद्धिसे ही विचारके द्वारा समझ रहे हैं। हमने तो जिन महापुरुषोंसे इस गूढ़ तत्त्वका उपदेश प्राप्त किया है, उनसे यही सुना है कि वह परब्रह्म परमेश्वर जड-चेतन दोनोंसे ही भिन्न है—जाननेमें आनेवाले सम्पूर्ण दृश्य

खण्ड १ ] केनोपनिषद् ५१

जड-वर्ग (क्षर) से तो वह सर्वथा भिन्न है और इस जड-वर्गको जाननेवाले परंतु स्वयं जाननेमें न आनेवाले जीवात्मा (अक्षर) से भी उत्तम है। ऐसी स्थितिमें उसके स्वरूपतत्त्वको वाणीके द्वारा व्यक्त करना कदापि सम्भव नहीं है। इसीसे उसको समझानेके लिये संकेतका ही आश्रय लेना पड़ता है [गीता १५।१८] ॥ ३ ॥

सम्बन्ध— अब उसी ब्रह्मको प्रश्नोंके अनुसार पुनः पाँच मन्त्रोंमें समझाते हैं—

यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ४ ॥

यत् = जो; वाचा = वाणीके द्वारा; अनभ्युदितम् = नहीं बतलाया गया है; [अपि तु = बल्कि;] येन = जिससे; वाक् = वाणी; अभ्युद्यते = बोली जाती है अर्थात् जिसकी शक्तिसे वक्ता बोलनेमें समर्थ होता है; तत् = उसको; एव = ही; त्वम् = तू; ब्रह्म = ब्रह्म; विद्धि = जान; इदम् यत् = वाणीके द्वारा बतानेमें आनेवाले जिस तत्त्वकी; उपासते = (लोग) उपासना करते हैं; इदम् = यह; न = ब्रह्म नहीं है ॥ ४ ॥

व्याख्या— वाणीके द्वारा जो कुछ भी व्यक्त किया जा सकता है तथा प्राकृत वाणीसे बतलाये हुए जिस तत्त्वकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप नहीं है। ब्रह्मतत्त्व वाणीसे सर्वथा अतीत है। उसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जिसकी शक्तिके किसी अंशसे वाणीमें प्रकाशित होनेकी—बोलनेकी शक्ति आयी है, जो वाणीका भी ज्ञाता, प्रेरक और प्रवर्तक है, वह ब्रह्म है। इस मन्त्रमें 'जिसकी प्रेरणासे वाणी बोली जाती है, वह कौन है?' इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है ॥ ४ ॥

यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ५ ॥

यत् = जिसको; (कोई भी) मनसा = मनसे (अन्तःकरणके द्वारा); न = नहीं; मनुते = समझ सकता; [अपि तु = बल्कि;] येन = जिससे; मनः = मन; मतम् = (मनुष्यका) जाना हुआ हो जाता है; आहुः = ऐसा कहते हैं; तत् = उसको;

५२ ईशादि नौ उपनिषद् [ खण्ड १

एव = ही; त्वम् = तू; ब्रह्म = ब्रह्म; विद्धि = जान; इदम् यत् = मन और बुद्धिके द्वारा जाननेमें आनेवाले जिस तत्त्वकी; उपासते = (लोग) उपासना करते हैं; इदम् = यह; न = ब्रह्म नहीं है॥ ५॥

**व्याख्या—**बुद्धि और मनका जो कुछ भी विषय है, जो इनके द्वारा जाननेमें आ सकता है तथा प्राकृत मन-बुद्धिसे जाने हुए जिस तत्त्वकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप नहीं है। परब्रह्म परमेश्वर मन और बुद्धिसे सर्वथा अतीत है। इसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जो मन-बुद्धिका ज्ञाता, उनको मनन और निश्चय करनेकी शक्ति देनेवाला तथा मनन और निश्चय करनेमें नियुक्त करनेवाला है तथा जिसकी शक्तिके किसी अंशसे बुद्धिमें निश्चय करनेकी और मनमें मनन करनेकी सामर्थ्य आयी है, वह ब्रह्म है। इस मन्त्रमें ‘जिसकी शक्ति और प्रेरणाको पाकर मन अपने ज्ञेय पदार्थोंको जानता है, वह कौन है?’ इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है॥ ५॥

यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥ ६॥

यत् = जिसको (कोई भी); चक्षुषा = चक्षुके द्वारा; = नहीं; पश्यति = देख सकता; [अपि तु = बल्कि;] येन = जिससे; चक्षूंषि = चक्षु; (अपने विषयोंको) पश्यति = देखता है; तत् = उसको; एव = ही; त्वम् = तू; ब्रह्म = ब्रह्म; विद्धि = जान; इदम् यत् = चक्षुके द्वारा देखनेमें आनेवाले जिस दृश्यवर्गकी; उपासते = (लोग) उपासना करते हैं; इदम् = यह; = ब्रह्म नहीं है॥ ६॥

**व्याख्या—**चक्षुका जो कुछ भी विषय है, जो इसके द्वारा देखने-जाननेमें आ सकता है तथा प्राकृत आँखोंसे देखे जानेवाले जिस पदार्थसमूहकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक रूप नहीं है। परब्रह्म परमेश्वर चक्षु आदि इन्द्रियोंसे सर्वथा अतीत है। उसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जिसकी शक्ति और प्रेरणासे चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने विषयको प्रत्यक्ष करनेमें समर्थ होती हैं, जो इनको जाननेवाला और इन्हें अपने विषयोंको

खण्ड १ ] केनोपनिषद् ५३


जाननेमें प्रवृत्त करनेवाला है तथा जिसकी शक्तिके किसी अंशका यह प्रभाव है वह ब्रह्म है। इस मन्त्रमें 'जिसकी शक्ति और प्रेरणासे चक्षु अपने विषयोंको देखता है, वह कौन है?' इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है॥ ६॥

यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदग्ं श्रुतम्।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥ ७॥

यत्=जिसको (कोई भी); श्रोत्रेण=श्रोत्रके द्वारा; =नहीं; शृणोति=सुन सकता; [अपि तु=बल्कि;] येन=जिससे; इदम्=यह; श्रोत्रम्=श्रोत्र-इन्द्रिय; श्रुतम्=सुनी हुई है; तत्=उसको; एव=ही; त्वम्=तू; ब्रह्म=ब्रह्म; विद्धि=जान; इदम् यत्=श्रोत्र-इन्द्रियके द्वारा जाननेमें आनेवाले जिस तत्त्वकी; उपासते=(लोग) उपासना करते हैं; इदम्=यह; =ब्रह्म नहीं है॥ ७॥

व्याख्या— जो कुछ भी सुननेमें आनेवाला पदार्थ है तथा प्राकृत कानोंसे सुने जानेवाले जिस वस्तु-समुदायकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप नहीं है। परब्रह्म परमेश्वर श्रोत्रेन्द्रियसे सर्वथा अतीत है। उसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जो श्रोत्र-इन्द्रियका ज्ञाता, प्रेरक और उसमें सुननेकी शक्ति देनेवाला है तथा जिसकी शक्तिके किसी अंशसे श्रोत्र-इन्द्रियमें शब्दोंको ग्रहण करनेकी सामर्थ्य आयी है, वह ब्रह्म है। इस मन्त्रमें 'जिसकी शक्ति और प्रेरणासे श्रोत्र अपने विषयोंको सुननेमें प्रवृत्त होता है, वह कौन है?' इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है॥ ७॥

यत् प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥ ८॥

यत्=जो; प्राणेन=प्राणके द्वारा; न प्राणिति=चेष्टायुक्त नहीं होता; [अपि तु=बल्कि; ] येन=जिससे; प्राणः=प्राण; प्रणीयते=चेष्टायुक्त होता है; तत्=उसको; एव=ही; त्वम्=तू; ब्रह्म=ब्रह्म; विद्धि=जान; इदम् यत्=प्राणोंकी शक्तिसे चेष्टायुक्त दीखनेवाले जिस तत्त्व-समुदायकी; उपासते=(लोग) उपासना करते हैं; इदम्=यह; =ब्रह्म नहीं है॥ ८॥

५४ ईशादि नौ उपनिषद् [ खण्ड २

**व्याख्या—**प्राणके द्वारा जो कोई भी चेष्टायुक्त की जानेवाली वस्तु है, तथा प्राकृत प्राणसे अनुप्राणित जिस तत्त्वकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप नहीं है। परब्रह्म परमेश्वर उससे सर्वथा अतीत है। उसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जो प्राणका ज्ञाता, प्रेरक और उसमें शक्ति देनेवाला है, जिसकी शक्तिके किसी अंशको प्राप्त करके और जिसकी प्रेरणासे यह प्रधान प्राण सबको चेष्टायुक्त करनेमें समर्थ होता है, वही सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ब्रह्म है। इस मन्त्रमें ‘जिसकी प्रेरणासे प्राण विचरता है, वह कौन है?’ इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है।

सारांश यह कि प्राकृत मन तथा इन्द्रियोंसे जिन विषयोंकी उपलब्धि होती है, वे सभी प्राकृत होते हैं; अतएव उनको परब्रह्म परमेश्वर परात्पर पुरुषोत्तमका वास्तविक स्वरूप नहीं माना जा सकता। इसलिये उनकी उपासना भी परब्रह्म परमेश्वरकी उपासना नहीं है। मन-बुद्धि आदिसे अतीत परब्रह्म परमेश्वरके स्वरूपको सांकेतिक भाषामें समझानेके लिये ही यहाँ गुरुने इन सबके ज्ञाता, शक्तिप्रदाता, स्वामी, प्रेरक, प्रवर्तक, सर्वशक्तिमान्, नित्य, अप्राकृत परम तत्त्वको ब्रह्म बतलाया है॥८॥

प्रथम खण्ड समाप्त॥ १ ॥


द्वितीय खण्ड

यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि
नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम्।
यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु
मीमाꣳस्यमेव ते मन्ये विदितम्॥ १॥

यदि=यदि; त्वम्=तू; इति=यह; मन्यसे=मानता है (कि); सुवेद=(मैं ब्रह्मको) भलीभाँति जान गया हूँ; अपि=तो; नूनम्=निश्चय ही; ब्रह्मणः=ब्रह्मका; रूपम्=स्वरूप;

खण्ड २ ] केनोपनिषद् ५५


दभ्रम्=थोड़ा-सा; एव=ही; (तू) वेत्थ=जानता है; (क्योंकि) अस्य=इस (परब्रह्म परमेश्वर)-का; यत्=जो (आंशिक) स्वरूप; त्वम्=तू है; (और) अस्य=इसका; यत्=जो (आंशिक) स्वरूप; देवेषु=देवताओंमें है; [तत् अल्पम् एव=वह सब मिलकर भी अल्प ही है;] अथ नु=इसीलिये; मन्ये=मैं मानता हूँ कि; ते विदितम्=तेरा जाना हुआ (स्वरूप); मीमांस्यम् एव=निस्संदेह विचारणीय है॥ १॥

व्याख्या—इस मन्त्रमें गुरु अपने शिष्यको सावधान करते हुए कहते हैं कि 'हमारे द्वारा संकेतसे बतलाये हुए ब्रह्मतत्त्वको सुनकर यदि तू ऐसा मानता है कि मैं उस ब्रह्मको भलीभाँति जान गया हूँ तो यह निश्चित है कि तूने ब्रह्मके स्वरूपको बहुत थोड़ा जाना है; क्योंकि उस परब्रह्मका अंशभूत जो जीवात्मा है, उसीको अथवा समस्त देवताओंमें—यानी मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय आदिमें जो ब्रह्मका अंश है, जिससे वे अपना काम करनेमें समर्थ हो रहे हैं, उसको यदि तू ब्रह्म समझता है तो तेरा यह समझना यथार्थ नहीं है। ब्रह्म इतना ही नहीं है। इस जीवात्माको और समस्त विश्व-ब्रह्माण्डमें व्याप्त जो ब्रह्मकी शक्ति है, उस सबको मिलाकर भी देखा जाय तो वह ब्रह्मका एक अंश ही है। अतएव तेरा समझा हुआ यह ब्रह्मतत्त्व तेरे लिये पुनः विचारणीय है, ऐसा मैं मानता हूँ'॥ १॥

सम्बन्धगुरुदेवके उपदेशपर गम्भीरतापूर्वक विचार करनेके अनन्तर शिष्य उनके सामने अपना विचार प्रकट करता है—

नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च । यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च॥ २॥

अहम्=मैं; सुवेद=ब्रह्मको भलीभाँति जान गया हूँ; इति न मन्ये=यों नहीं मानता; (और) नो=न; इति=ऐसा (ही मानता हूँ कि); न वेद=नहीं जानता; (क्योंकि) वेद च=जानता भी हूँ; (किंतु यह जानना विलक्षण है) नः=हम शिष्योंमेंसे; यः=जो कोई भी; तत्=उस ब्रह्मको; वेद=जानता है; तत्=(वही) मेरे उक्त वचनके अभिप्रायको; =भी; वेद=जानता है; (कि) वेद=मैं जानता हूँ; (और) न वेद=नहीं जानता; इति=ये दोनों ही; नो=नहीं हैं॥ २॥

५६ ईशादि नौ उपनिषद् [ खण्ड २

**व्याख्या—**इस मन्त्रमें शिष्यने अपने गुरुदेवके प्रति संकेतसे अपना अनुभव इस प्रकार प्रकट किया है कि “उस ब्रह्मको मैं भलीभाँति जानता हूँ, यह मैं नहीं मानता और न यह ही मानता हूँ कि मैं उसे नहीं जानता; क्योंकि मैं जानता भी हूँ। तथापि मेरा यह जानना वैसा नहीं है, जैसा कि किसी ज्ञाताका किसी ज्ञेय वस्तुको जानना है। यह उससे सर्वथा विलक्षण और अलौकिक है। इसलिये मैं जो यह कह रहा हूँ कि 'मैं उसे नहीं जानता—ऐसा भी नहीं और जानता हूँ—ऐसा भी नहीं; तो भी मैं उसे जानता हूँ।' मेरे इस कथनके रहस्यको हम शिष्योंमेंसे वही ठीक समझ सकता है, जो उस ब्रह्मको जानता है”॥ २॥

**सम्बन्ध—**अब श्रुति स्वयं उपर्युक्त गुरु-शिष्य-संवादका निष्कर्ष कहती है—

यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः। अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्॥ ३॥

**यस्य अमतम्=**जिसका यह मानना है कि ब्रह्म जाननेमें नहीं आता; **तस्य=**उसका; मतम्=(तो वह) जाना हुआ है; (और) **यस्य=**जिसका; **मतम्=**यह मानना है कि ब्रह्म मेरा जाना हुआ है; **सः=**वह; **न=**नहीं; **वेद=**जानता; (क्योंकि) **विजानताम्=**जाननेका अभिमान रखनेवालोंके लिये; अविज्ञातम्=(वह ब्रह्मतत्त्व) जाना हुआ नहीं है; (और) **अविजानताम्=**जिनमें ज्ञातापनका अभिमान नहीं है, उनका; विज्ञातम्=(वह ब्रह्मतत्त्व) जाना हुआ है अर्थात् उनके लिये वह अपरोक्ष है॥ ३॥

**व्याख्या—**जो महापुरुष परब्रह्म परमेश्वरका साक्षात् कर लेते हैं, उनमें किञ्चिन्मात्र भी ऐसा अभिमान नहीं रह जाता कि हमने परमेश्वरको जान लिया है। वे परमात्माके अनन्त असीम महिमा-महार्णवमें निमग्न हुए यही समझते कि परमात्मा स्वयं ही अपनेको जानते हैं। दूसरा कोई भी ऐसा नहीं है, जो उनका पार पा सके। भला, असीमकी सीमा ससीम कैसे पा सकता है? अतएव जो यह मानता है कि मैंने ब्रह्मको जान लिया है, मैं ज्ञानी

खण्ड २ ] केनोपनिषद् ५७

हूँ, परमेश्वर मेरे ज्ञेय हैं, वह वस्तुतः सर्वथा भ्रममें है; क्योंकि ब्रह्म इस प्रकार ज्ञानका विषय नहीं है। जितने भी ज्ञानके साधन हैं, उनमेंसे एक भी ऐसा नहीं जो ब्रह्मतक पहुँच सके। अतएव इस प्रकारके जाननेवालोंके लिये परमात्मा सदा अज्ञात हैं; जबतक जाननेका अभिमान रहता है, तबतक परमेश्वरका साक्षात्कार नहीं होता। परमेश्वरका साक्षात्कार उन्हीं भाग्यवान् महापुरुषोंको होता है, जिनमें जाननेका अभिमान किञ्चित् भी नहीं रह गया है॥ ३ ॥

प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते।
आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम्॥ ४॥

प्रतिबोधविदितम्=उपर्युक्त प्रतिबोध (संकेत) से उत्पन्न ज्ञान ही; मतम्=वास्तविक ज्ञान है; हि=क्योंकि (इससे); अमृतत्वम्=अमृतस्वरूप परमात्माको; विन्दते=(मनुष्य) प्राप्त करता है; आत्मना=अन्तर्यामी परमात्मासे; वीर्यम्=परमात्माको जाननेकी शक्ति (ज्ञान); विन्दते=प्राप्त करता है; (और उस) विद्यया=विद्या—ज्ञानसे; अमृतम्=अमृतरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमको; विन्दते=प्राप्त होता है॥ ४॥

व्याख्या—उपर्युक्त वर्णनमें परमात्माके जिस स्वरूपका लक्ष्य कराया गया था उसको भलीभाँति समझ लेना ही वास्तविक ज्ञान है और इसी ज्ञानसे परमात्माकी प्राप्ति होती है। परमात्माका ज्ञान करानेकी यह जो ज्ञानरूपी शक्ति है, यह मनुष्यको अन्तर्यामी परमात्मासे ही मिलती है। मन्त्रमें विद्यासे अमृतरूप परब्रह्मकी प्राप्ति होती है, यह इसीलिये कहा गया है कि जिससे मनुष्यमें परब्रह्म पुरुषोत्तमके यथार्थ स्वरूपको जाननेके लिये रुचि और उत्साहकी वृद्धि हो॥ ४॥

सम्बन्ध—अब उस ब्रह्मतत्त्वको इसी जन्ममें जान लेना अत्यन्त आवश्यक है—यह बतलाकर इस प्रकरणका उपसंहार किया जाता है—

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।
भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति॥ ५॥

चेत्=यदि; इह=इस मनुष्य-शरीरमें; अवेदीत्=(परब्रह्मको) जान लिया;

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ खण्ड २ ]

अथ=तब तो; सत्यम्=बहुत कुशल; अस्ति=है; चेत्=यदि; इह=इस शरीरके रहते-रहते; न अवेदीत्=(उसे) नहीं जान पाया (तो); महती=महान्; विनष्टिः=विनाश है; (यही सोचकर) धीराः=बुद्धिमान् पुरुष; भूतेषु भूतेषु=प्राणी-प्राणीमें (प्राणिमात्रमें) विचिन्त्य=(परब्रह्म पुरुषोत्तमको) समझकर; अस्मात्=इस; लोकात्=लोकसे; प्रेत्य=प्रयाण करके; अमृताः=अमर; भवन्ति=हो जाते हैं ॥५॥

व्याख्या —मानव-जन्म अत्यन्त दुर्लभ है; इसे पाकर जो मनुष्य परमात्माकी प्राप्तिके साधनमें तत्परताके साथ नहीं लग जाता, वह बहुत बड़ी भूल करता है। अतएव श्रुति कहती है कि ‘जबतक यह दुर्लभ मानव-शरीर विद्यमान है, भगवत्कृपासे प्राप्त साधन-सामग्री उपलब्ध है, तभीतक शीघ्र-से-शीघ्र परमात्माको जान लिया जाय तो सब प्रकारसे कुशल है—मानव-जन्मकी परम सार्थकता है। यदि यह अवसर हाथसे निकल गया तो फिर महान् विनाश हो जायगा—बार-बार मृत्युरूप संसारके प्रवाहमें बहना पड़ेगा। फिर, रो-रोकर पश्चाताप करनेके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं रह जायगा। संसारके त्रिविध तापों और विविध शूलोंसे बचनेका यही एक परम साधन है कि जीव मानव-जन्ममें दक्षताके साथ साधन-परायण होकर अपने जीवनको सदाके लिये सार्थक कर ले। मनुष्य-जन्मके सिवा जितनी और योनियाँ हैं, सभी केवल कर्मोंका फल भोगनेके लिये ही मिलती हैं। उनमें जीव परमात्माको प्राप्त करनेका कोई साधन नहीं कर सकता। बुद्धिमान् पुरुष इस बातको समझ लेते हैं और इसीसे वे प्रत्येक जातिके प्रत्येक प्राणीमें परमात्माका साक्षात्कार करते हुए सदाके लिये जन्म-मृत्युके चक्रसे छूटकर अमर हो जाते हैं ॥५॥

द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥

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तृतीय खण्ड

सम्बन्ध— प्रथम प्रकरणमें ब्रह्मका स्वरूप-तत्त्व समझानेके लिये उसकी शक्तिका सांकेतिक भाषामें विभिन्न प्रकारसे दिग्दर्शन कराया गया। द्वितीय प्रकरणमें ब्रह्मज्ञानकी विलक्षणता बतलानेके लिये यह कहा गया कि प्रथम प्रकरणके वर्णनसे आपाततः ब्रह्मका जैसा स्वरूप समझमें आता है, वस्तुतः उसका पूर्णस्वरूप उतना ही नहीं है। वह तो उसकी महिमाका अंशमात्र है। जीवात्मा, मन, प्राण, इन्द्रिय आदि तथा उनके देवता—सभी उसीसे अनुप्राणित, प्रेरित और शक्तिमान् होकर कार्यक्षम होते हैं। अब इस तीसरे प्रकरणमें दृष्टान्तके द्वारा यह समझाया जाता है कि विश्वमें जो कोई भी प्राणी या पदार्थ शक्तिमान्, सुन्दर और प्रिय प्रतीत होते हैं, उनके जीवनमें जो सफलता दीखती है, वह सभी उस परब्रह्म परमेश्वरके एक अंशकी ही महिमा है (गीता १०। ४१)। इनपर यदि कोई अभिमान करता है तो वह बहुत बड़ी भूल करता है—

ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त
त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति ॥ १ ॥

ब्रह्म = परब्रह्म परमेश्वरने; = ही; देवेभ्यः = देवताओंके लिये (उनको निमित्त बनाकर); विजिग्ये = (असुरोंपर) विजय प्राप्त की; = किंतु; तस्य = उस; ब्रह्मणः = परब्रह्म पुरुषोत्तमकी; विजये = विजयमें; देवाः = इन्द्रादि देवताओंने; अमहीयन्त = अपनेमें महत्त्वका अभिमान कर लिया; ते = वे; इति = यों; ऐक्षन्त = समझने लगे (कि); अयम् = यह; अस्माकम् एव = हमारी ही; विजयः = विजय है; (और) अयम् = यह; अस्माकम् एव = हमारी ही; महिमा = महिमा है ॥ १ ॥

व्याख्या— परब्रह्म पुरुषोत्तमने देवोंपर कृपा करके उन्हें शक्ति प्रदान की, जिससे उन्होंने असुरोंपर विजय प्राप्त कर ली। यह विजय वस्तुतः भगवान्‌की ही थी, देवता तो केवल निमित्तमात्र थे; परंतु इस ओर देवताओंका ध्यान नहीं गया और वे भगवान्‌की कृपाकी ओर लक्ष्य न करके भगवान्‌की महिमाको अपनी महिमा समझ बैठे और अभिमानवश यह मानने लगे कि हम बड़े भारी शक्तिशाली हैं एवं हमने अपने ही बल-पौरुषसे असुरोंको पराजित किया है॥ १ ॥

६० ईशादि नौ उपनिषद् [ खण्ड ३

तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानत किमिदं यक्षमिति ॥ २ ॥

ह तत्=प्रसिद्ध है कि उस परब्रह्मने; एषाम्=इन देवताओंके (अभिमानको); विजज्ञौ=जान लिया; (और कृपापूर्वक उनका अभिमान नष्ट करनेके लिये वह) तेभ्यः=उनके सामने; =ही; प्रादुर्बभूव=साकाररूपमें प्रकट हो गया; तत्=उसको (यक्षरूपमें प्रकट हुआ देखकर भी); इदम्=यह; यक्षम्=दिव्य यक्ष; किम् इति=कौन है, इस बातको; न व्यजानत= (देवताओंने) नहीं जाना ॥ २ ॥

व्याख्या—देवताओंके मिथ्या अभिमानको करुणावरुणालय भगवान् समझ गये। भक्त-कल्याणकारी भगवान्ने सोचा कि यह अभिमान बना रहा तो इनका पतन हो जायगा। भक्त-सुहृद् भगवान् भक्तोंका पतन कैसे सह सकते थे। अतः देवताओंपर कृपा करके उनका दर्प चूर्ण करनेके लिये वे उनके सामने दिव्य साकार यक्षरूपमें प्रकट हो गये। देवता आश्चर्यचकित होकर उस अत्यन्त अद्भुत विशाल रूपको देखने और विचार करने लगे कि यह दिव्य यक्ष कौन है; पर वे उसको पहचान नहीं सके ॥ २ ॥

तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेद एतद् विजानीहि किमिदं यक्षमिति तथेति ॥ ३ ॥

ते=उन इन्द्रादि देवताओंने; अग्निम्=अग्निदेवसे; [इति=इस प्रकार;] अब्रुवन्=कहा; जातवेदः=हे जातवेदा; (आप जाकर) एतत्=इस बातको; विजानीहि=जानिये—इसका भलीभाँति पता लगाइये (कि); इदम् यक्षम्=यह दिव्य यक्ष; किम् इति=कौन है; तथा इति=(अग्निने कहा—) बहुत अच्छा ! ॥ ३ ॥

व्याख्या—देवता उस अति विचित्र महाकाय दिव्य यक्षको देखकर मन-ही-मन सहम-से गये और उसका परिचय जाननेके लिये व्यग्र हो उठे। अग्निदेवता परम तेजस्वी हैं, वेदार्थके ज्ञाता हैं; समस्त जात-पदार्थोंका पता

खण्ड ३ ] केनोपनिषद् ६१


रखते हैं और सर्वज्ञ-से हैं। इसीसे उनका गौरवयुक्त नाम 'जातवेदा' है। देवताओंने इस कार्यके लिये अग्निको ही उपयुक्त समझा और उन्होंने कहा—'हे जातवेदा! आप जाकर इस यक्षका पूरा पता लगाइये कि यह कौन है।' अग्निदेवताको अपनी बुद्धि-शक्तिका गर्व था। अतः उन्होंने कहा—'अच्छी बात है, अभी पता लगाता हूँ'॥ ३॥

तदभ्यद्रवत् तमभ्यवदत् कोऽसीत्यग्निर्वा अहमस्मीत्यब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति ॥ ४ ॥

तत्=उसके समीप; (अग्निदेव) अभ्यद्रवत्=दौड़कर गया; तम्=उस अग्निदेवसे; अभ्यवदत्=(उस दिव्य यक्षने) पूछा; कः असि इति=(कि तुम) कौन हो; अब्रवीत्=(अग्निने) यह कहा (कि); अहम्=मैं; वै अग्निः=प्रसिद्ध अग्निदेव; अस्मि इति=हूँ; (और) अहम् वै=मैं ही; जातवेदाः=जातवेदाके नामसे; अस्मि इति=प्रसिद्ध हूँ॥ ४॥

**व्याख्या—**अग्निदेवताने सोचा, इसमें कौन बड़ी बात है; इसलिये वे तुरंत यक्षके समीप जा पहुँचे। उन्हें अपने समीप खड़ा देखकर यक्षने पूछा—आप कौन हैं? अग्निने सोचा—मेरे तेजःपुञ्ज स्वरूपको सभी पहचानते हैं, इसने कैसे नहीं जाना; अतः उन्होंने तमककर उत्तर दिया—'मैं प्रसिद्ध अग्नि हूँ, मेरा ही गौरवमय और रहस्यपूर्ण नाम जातवेदा है'॥ ४॥

**सम्बन्ध—**तब यक्षरूपी ब्रह्मने अग्निसे पूछा—

तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमिति। अपीदꣳसर्वं दहेयम्, यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ५ ॥

तस्मिन् त्वयि=उक्त नामोंवाले तुझ अग्निमें; किं वीर्यम्=क्या सामर्थ्य है; इति=यह बता; (तब अग्निने यह उत्तर दिया कि) अपि=यदि (मैं चाहूँ तो); पृथिव्याम्=पृथ्वीमें; यत् इदम्=यह जो कुछ भी है; इदम् सर्वम्=इस सबको; दहेयम् इति=जलाकर भस्म कर दूँ॥ ५॥

**व्याख्या—**अग्निकी गर्वोक्ति सुनकर ब्रह्मने अनजानकी भाँति कहा—

६२ ईशादि नौ उपनिषद् [ खण्ड ३

'अच्छा! आप अग्निदेवता हैं और जातवेदा—सबका ज्ञान रखनेवाले भी आप ही हैं? बड़ी अच्छी बात है, पर यह तो बताइये कि आपमें क्या शक्ति है; आप क्या कर सकते हैं? इसपर अग्निने पुनः सगर्व उत्तर दिया—'मैं क्या कर सकता हूँ' इसे आप जानना चाहते हैं? अरे, मैं चाहूँ तो इस सारे भूमण्डलमें जो कुछ भी देखनेमें आ रहा है, सबको जलाकर अभी राखका ढेर कर दूँ' ॥ ५॥

तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति। तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते, नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद् यक्षमिति॥ ६॥

(तब उस दिव्य यक्षने) तस्मै=उस अग्निदेवके सामने; तृणम्=एक तिनका; निदधौ=रख दिया; (और) इति=यह कहा कि; एतत्=इस तिनकेको; दह= जला दो; सः=वह (अग्नि); सर्वजवेन=पूर्ण शक्ति लगाकर; तत् उपप्रेयाय= उस तिनकेपर टूट पड़ा (परंतु); तत्=उसको; दग्धुम्=जलानेमें; न एव शशाक=किसी प्रकार समर्थ नहीं हुआ; ततः=(तब लज्जित होकर) वहाँसे; निववृते=लौट गया (और देवताओंसे बोला); एतत्=यह; विज्ञातुम्=जाननेमें; न अशकम्=मैं समर्थ नहीं हो सका (कि वस्तुतः); एतत्=यह; यक्षम्=दिव्य यक्ष; यत् इति=कौन है॥ ६॥

व्याख्या—अग्निदेवताकी पुनः गर्वोक्ति सुनकर सबको सत्ताशक्ति देनेवाले यक्षरूपी परब्रह्म परमेश्वरने उनके आगे एक सूखा तिनका डालकर कहा— 'आप तो सभीको जला सकते हैं; तनिक-सा बल लगाकर इस सूखे तृणको जला दीजिये।' अग्निदेवताने मानो इसको अपना अपमान समझा और वे सहज ही उस तृणके पास पहुँचे और उसे जलाना चाहा; जब नहीं जला तब उन्होंने उसे जलानेके लिये अपनी पूरी शक्ति लगा दी। पर उसको तनिक- सी आँच भी नहीं लगी। आँच लगती कैसे? अग्निमें जो अग्नित्व है—दाहिका शक्ति है, वह तो शक्तिके मूलभण्डार परमात्मासे ही मिली हुई है। वे यदि उस शक्तिस्रोतको रोक दें तो फिर शक्ति कहाँसे आयेगी। अग्निदेव इस बातको न समझकर ही डींग हाँक रहे थे। पर जब ब्रह्मने अपनी शक्तिको रोक

खण्ड ३ ] केनोपनिषद् ६३

लिया, सूखा तिनका नहीं जल सका, तब तो उनका सिर लज्जासे झुक गया और वे हतप्रतिज्ञ और हतप्रभ होकर चुपचाप देवताओंके पास लौट आये और बोले कि 'मैं तो भलीभाँति नहीं जान सका कि यह यक्ष कौन है'॥ ६ ॥

अथ वायुमब्रुवन् वायवेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति तथेति ॥ ७ ॥

अथ=तब; वायुम्=वायुदेवतासे; अब्रुवन्=(देवताओंने) कहा; वायो=हे वायुदेव! (जाकर); एतत्=इस बातको; विजानीहि=आप जानिये—इसका भलीभाँति पता लगाइये (कि); एतत्=यह; यक्षम्=दिव्य यक्ष; किम् इति=कौन है; (वायुने कहा) तथा इति=बहुत अच्छा!॥ ७॥

**व्याख्या—**जब अग्निदेव असफल होकर लौट आये, तब देवताओंने इस कार्यके लिये अप्रतिमशक्ति वायुदेवको चुना और उनसे कहा कि 'वायुदेव! आप जाकर इस यक्षका पूरा पता लगाइये कि यह कौन है।' वायुदेवको भी अपनी बुद्धि-शक्तिका गर्व था; अतः उन्होंने भी कहा—'अच्छी बात है, अभी पता लगाता हूँ'॥ ७॥

तदभ्यद्रवत् तमभ्यवदत् कोऽसीति। वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति ॥ ८ ॥

तत्=उसके समीप; अभ्यद्रवत्=(वायुदेवता) दौड़कर गया; तम्=उससे (भी); अभ्यवदत्=(उस दिव्य यक्षने) पूछा; कः असि इति=(कि तुम) कौन हो; अब्रवीत्=(तब वायुने) यह कहा (कि); अहम्=मैं; वै वायुः=प्रसिद्ध वायुदेव; अस्मि इति=हूँ; (और) अहम् वै=मैं ही; मातरिश्वा=मातरिश्वाके नामसे; अस्मि इति=प्रसिद्ध हूँ॥ ८॥

**व्याख्या—**वायुदेवताने सोचा, 'अग्नि कहीं भूल कर गये होंगे; नहीं तो यक्षका परिचय जानना कौन बड़ी बात थी। अस्तु, इस सफलताका श्रेय मुझको मिलेगा।' यह सोचकर वे तुरंत यक्षके समीप जा पहुँचे। उन्हें अपने

६४ ईशादि नौ उपनिषद् [ खण्ड ३

समीप खड़ा देखकर यक्षने पूछा—'आप कौन हैं? वायुने भी अपने गुण-गौरवके गर्वसे तमककर उत्तर दिया 'मैं प्रसिद्ध वायु हूँ, मेरा ही गौरवमय और रहस्यपूर्ण नाम मातरिश्वा है'॥८॥

सम्बन्ध— यक्षरूपी ब्रह्मने वायुसे पूछा—

तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमिति ? अपीद ूँ सर्वमाददीयम्, यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ९॥

तस्मिन् त्वयि = उक्त नामोंवाले तुझ वायुमें; किं वीर्यम् = क्या सामर्थ्य है; इति = यह बता; (तब वायुने यह उत्तर दिया कि) अपि = यदि (मैं चाहूँ तो); पृथिव्याम् = पृथ्वीमें; यत् इदम् = यह जो कुछ भी है; इदम् सर्वम् = इस सबको; आददीयम् इति = उठा लूँ—आकाशमें उड़ा दूँ॥९॥

व्याख्या— वायुकी भी वैसी ही गर्वोक्ति सुनकर ब्रह्मने इनसे भी वैसे ही अनजानकी भाँति कहा—'अच्छा! आप वायुदेवता हैं और मातरिश्वा—अन्तरिक्षमें बिना ही आधारके विचरण करनेवाले भी आप ही हैं? बड़ी अच्छी बात है! पर यह तो बताइये कि आपमें क्या शक्ति है—आप क्या कर सकते हैं? इसपर वायुने भी अग्निकी भाँति पुनः सगर्व उत्तर दिया कि 'मैं चाहूँ तो इस सारे भूमण्डलमें जो कुछ भी देखनेमें आ रहा है, सबको बिना आधारके उठा लूँ—उड़ा दूँ'॥९॥

तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति। तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाकादातुं स तत एव निववृते, नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद् यक्षमिति ॥ १०॥

(तब उस दिव्य यक्षने) तस्मै = उस वायुदेवके सामने; तृणम् = एक तिनका; निदधौ = रख दिया; (और यह कहा कि) एतत् = इस तिनकेको; आदत्स्व इति = उठा लो—उड़ा दो; सः = वह (वायु); सर्वजवेन = पूर्ण शक्ति लगाकर; तत् उपप्रेयाय = उस तिनकेपर झपटा (परंतु); तत् = उसको; आदातुम् = उड़ानेमें; न एव शशाक = किसी प्रकार भी समर्थ नहीं हुआ; ततः = (तब लज्जित होकर) वहाँसे;

खण्ड ३ ] केनोपनिषद् ६५

निववृते=लौट गया (और देवताओंसे बोला) एतत्=यह; विज्ञातुम्=जाननेमें; न अशकम्=मैं समर्थ नहीं हो सका (कि वस्तुतः); एतत्=यह; यक्षम्=दिव्य यक्ष; यत् इति=कौन है॥ १०॥

व्याख्या—वायुदेवताकी भी पुनः वैसी ही गर्वोक्ति सुनकर सबको सत्ता- शक्ति देनेवाले परब्रह्म परमेश्वरने उनके आगे भी एक सूखा तिनका डालकर कहा—'आप तो सभीको उड़ा सकते हैं, तनिक-सा बल लगाकर इस सूखे तृणको उड़ा दीजिये।' वायुदेवताने भी मानो इसको अपना अपमान समझा और वे सहज ही उस तृणके पास पहुँचे, उसे उड़ाना चाहा; जब नहीं उड़ा तब उन्होंने अपनी पूरी शक्ति लगा दी। परंतु शक्तिमान् परमात्माके द्वारा शक्ति रोक लिये जानेके कारण वे उसे तनिक-सा हिला भी नहीं सके और अग्निकी ही भाँति हतप्रतिज्ञ और हतप्रभ होकर लज्जासे सिर झुकाये वहाँसे लौट आये एवं देवताओंसे बोले कि 'मैं तो भलीभाँति नहीं जान सका कि यह यक्ष कौन है?'॥ १०॥

अथेन्द्रमब्रुवन् मघवन्नेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति । तथेति । तदभ्यद्रवत् । तस्मात् तिरोदधे ॥ ११ ॥

अथ=तदनन्तर; इन्द्रम्=इन्द्रसे; अब्रुवन्=(देवताओंने) यह कहा; मघवन्=हे इन्द्रदेव !; एतत्=इस बातको; विजानीहि=आप जानिये—भलीभाँति पता लगाइये (कि); एतत्=यह; यक्षम्=दिव्य यक्ष; किम् इति=कौन है; (तब इन्द्रने कहा) तथा इति=बहुत अच्छा; तत् अभ्यद्रवत्=(और वे) उस यक्षकी ओर दौड़कर गये (परंतु वह दिव्य यक्ष); तस्मात्=उनके सामनेसे; तिरोदधे=अन्तर्धान हो गया ॥ ११ ॥

व्याख्या—जब अग्नि और वायु-सरीखे अप्रतिमशक्ति और बुद्धिसम्पन्न देवता असफल होकर लौट आये और उन्होंने कोई कारण भी नहीं बताया, तब देवताओंने विचार करके स्वयं देवराज इन्द्रको इस कार्यके लिये चुना और उन्होंने कहा—'हे महान् बलशाली देवराज ! अब आप ही जाकर पूरा पता लगाइये कि यह यक्ष कौन है। आपके सिवा अन्य किसीके इस काममें सफल होनेकी सम्भावना नहीं है।' इन्द्र 'बहुत अच्छा' कहकर तुरंत यक्षके पास गये;

६६ ईशादि नौ उपनिषद् [ खण्ड ३

पर उनके यहाँ पहुँचते ही वह उनके सामनेसे अन्तर्धान हो गया। इन्द्रमें इन देवताओंसे अधिक अभिमान था; इसलिये ब्रह्मने उनको वार्तालापका अवसर नहीं दिया। परंतु इस एक दोषके अतिरिक्त अन्य सब प्रकारसे इन्द्र अधिकारी थे, अतः उन्हें ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान कराना आवश्यक समझकर इसीकी व्यवस्थाके लिये वे स्वयं अन्तर्धान हो गये ॥ ११ ॥

स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमाँहैमवतीं ताँहोवाच किमेतद् यक्षमिति ॥ १२ ॥

सः=वे इन्द्र; तस्मिन् एव=उसी; आकाशे=आकाशप्रदेशमें (यक्षके स्थानपर ही); बहुशोभमानाम्=अतिशय सुन्दरी; स्त्रियम्=देवी; हैमवतीम्=हिमाचलकुमारी; उमाम्=उमाके पास; आजगाम=आ पहुँचे (और); ताम्=उनसे; ह उवाच=(सादर) यह बोले (देवि!); एतत्=यह; यक्षम्=दिव्य यक्ष; किम् इति=कौन था ॥ १२ ॥

**व्याख्या—**यक्षके अन्तर्धान हो जानेपर इन्द्र वहीं खड़े रहे, अग्नि-वायुकी भाँति वहाँसे लौटे नहीं। इतनेहीमें उन्होंने देखा कि जहाँ दिव्य यक्ष था, ठीक उसी जगह अत्यन्त शोभामयी हिमाचलकुमारी उमादेवी प्रकट हो गयी हैं। उन्हें देखकर इन्द्र उनके पास चले गये। इन्द्रपर कृपा करके करुणामय परब्रह्म पुरुषोत्तमने ही उमारूपा साक्षात् ब्रह्मविद्याको प्रकट किया था। इन्द्रने भक्तिपूर्वक उनसे कहा—‘भगवती ! आप सर्वज्ञशिरोमणि ईश्वर श्रीशङ्करकी स्वरूपा-शक्ति हैं। अतः आपको अवश्य ही सब बातोंका पता है। कृपापूर्वक मुझे बतलाइये कि यह दिव्य यक्ष, जो दर्शन देकर तुरंत ही छिप गया, वस्तुतः कौन है और किस हेतुसे यहाँ प्रकट हुआ था’॥ १२ ॥

तृतीय खण्ड समाप्त ॥ ३ ॥

चतुर्थ खण्ड

सा ब्रह्मेति होवाच। ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयध्वमिति, ततो हैव विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ १ ॥

सा=उस (भगवती उमादेवी) ने; ह उवाच=स्पष्ट उत्तर दिया कि; ब्रह्म इति=(वे तो) परब्रह्म परमात्मा हैं; ब्रह्मणः वै=उन परमात्माकी ही; एतद्विजये=इस विजयमें; महीयध्वम् इति=तुम अपनी महिमा मानने लगे थे; ततः एव=उमाके इस कथनसे ही; =निश्चयपूर्वक; विदाञ्चकार=(इन्द्रने) समझ लिया (कि); ब्रह्म इति=(यह) ब्रह्म है॥ १ ॥

व्याख्या—देवराज इन्द्रके पूछनेपर भगवती उमादेवीने इन्द्रसे कहा कि 'तुम जिन दिव्य यक्षको देख रहे थे और जो इस समय अन्तर्धान हो गये हैं, वे साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर हैं। तुमलोगोंने जो असुरोंपर विजय प्राप्त की है, यह उन ब्रह्मकी शक्तिसे ही की है; अतएव वस्तुतः यह उन परब्रह्मकी ही विजय है, तुम तो इसमें निमित्तमात्र थे। परंतु तुमलोगोंने ब्रह्मकी इस विजयको अपनी विजय मान लिया और उनकी महिमाको अपनी महिमा समझने लगे।

यह तुम्हारा मिथ्याभिमान था और जिन परम कारुणिक परमात्माने तुमलोगोंपर कृपा करके असुरोंपर तुम्हें विजय प्रदान करायी, उन्हीं परमात्माने तुम्हारे मिथ्याभिमानका नाश करके तुम्हारा कल्याण करनेके लिये यक्षके रूपमें प्रकट होकर अग्नि और वायुका गर्व चूर्ण किया एवं तुम्हें वास्तविक ज्ञान देनेके लिये मुझे प्रेरित किया। अतएव तुम अपनी स्वतन्त्र शक्तिके सारे अभिमानका त्याग करके, जिन ब्रह्मकी महिमासे महिमान्वित और शक्तिमान् बने हो, उन्हींकी महिमा समझो। स्वप्नमें भी यह भावना मत करो कि ब्रह्मकी शक्तिके बिना अपनी स्वतन्त्र शक्तिसे कोई भी कुछ कर सकता है।' उमाके इस उत्तरसे देवताओंमें सबसे पहले इन्द्रको यह निश्चय हुआ कि यक्षके रूपमें स्वयं ब्रह्म ही उन लोगोंके सामने प्रकट हुए थे॥ १ ॥

६८

ईशादि नौ उपनिषद्

[ खण्ड ४ ]

तस्माद्वा एते देवा अतितरामिवान्यान् देवान् यदग्निर्वार्युरिन्द्रस्ते होनत्रेदिष्टं पस्पृशुस्ते होनन्तु प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ २ ॥

तस्मात् वै=इसीलिये; एते देवाः=ये तीनों देवता; यत्=जो कि; अग्निः=अग्नि; वायुः=वायु (और); इन्द्रः=इन्द्रके नामसे प्रसिद्ध हैं; अन्यान्=दूसरे (चन्द्रमा आदि); देवान्=देवोंकी अपेक्षा; अतितराम् इव=मानो अतिशय श्रेष्ठ हैं; हि=क्योंकि; ते=उन्होंने ही; एनत् नैदिष्टम्=इन अत्यन्त प्रिय और समीपस्थ परमेश्वरको; पस्पृशुः=(दर्शनद्वारा) स्पर्श किया है; ते हि=(और) उन्होंने ही; एनत्=इनको; प्रथमः=सबसे पहले; विदाञ्चकार=जाना है (कि); ब्रह्म इति=ये साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर हैं ॥ २ ॥

व्याख्या —समस्त देवताओंमें अग्नि, वायु और इन्द्रको ही परम श्रेष्ठ मानना चाहिये; क्योंकि उन्हीं तीनोंने ब्रह्मका संस्पर्श प्राप्त किया है। परब्रह्म परमात्माके दर्शनका, उनका परिचय प्राप्त करनेके प्रयत्नमें प्रवृत्त होनेका और उनके साथ वार्तालापका परम सौभाग्य उन्हींको प्राप्त हुआ और उन्होंने ही सबसे पहले इस सत्यको समझा कि हमलोगोंने जिनका दर्शन प्राप्त किया है, जिसे वार्तालाप किया है और जिनकी शक्तिसे असुरोंपर विजय प्राप्त की है, वे ही साक्षात् पूर्णब्रह्म परमात्मा हैं।

सारांश यह कि जिन सौभाग्यशाली महापुरुषको किसी भी कारणसे भगवान्के दिव्य संस्पर्शका सौभाग्य प्राप्त हो गया है, जो उनके दर्शन, स्पर्श और उनके साथ सद्वाप करनेका सुअवसर पा चुके हैं, उनकी महिमा इस मन्त्रमें इन्द्रादि देवताओंका उदाहरण देकर की गयी है ॥ २ ॥

सम्बन्ध —अब यह कहते हैं कि इन तीनों देवताओंमें भी अग्नि और वायुकी अपेक्षा देवराज इन्द्र श्रेष्ठ हैं—

तस्माद् वा इन्द्रोऽतितरामिवान्यान् देवान् स होनत्रेदिष्टं पस्पृशं, स होनन्तु प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ ३ ॥

तस्मात् वै=इसीलिये; इन्द्रः=इन्द्र; अन्यान् देवान्=दूसरे देवताओंकी अपेक्षा; अतितराम् इव=मानो अतिशय श्रेष्ठ हैं; हि=क्योंकि; सः=उसने; एनत् नैदिष्टम्=इन

खण्ड ४ ] केनोपनिषद् ६१


अत्यन्त प्रिय और समीपस्थ परमेश्वरको; पस्पर्श=(उमादेवीसे सुनकर सबसे पहले) मनके द्वारा स्पर्श किया; स हि=(और) उसीने; एनत्=इनको; प्रथमः=अन्यान्य देवताओंसे पहले; विदाञ्चकार=भलीभाँति जाना है (कि); ब्रह्म इति=ये साक्षात् परब्रह्म पुरुषोत्तम हैं॥ ३ ॥

व्याख्या—अग्नि तथा वायुने दिव्य यक्षके रूपमें ब्रह्मका दर्शन और उसके साथ वार्तालापका सौभाग्य तो प्राप्त किया था; परंतु उन्हें उसके स्वरूपका ज्ञान नहीं हुआ था। भगवती उमाके द्वारा सबसे पहले देवराज इन्द्रको सर्वशक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वका ज्ञान हुआ। तदनन्तर इन्द्रके बतलानेपर अग्नि और वायुको उनके स्वरूपका पता लगा और उसके बाद इनके द्वारा अन्य सब देवताओंने यह जाना कि हमें जो दिव्य यक्ष दिखलायी दे रहे थे, वे साक्षात् परब्रह्म पुरुषोत्तम ही हैं। इस प्रकार अन्यान्य देवताओंने केवल सुनकर जाना; परंतु उन्हें परब्रह्म पुरुषोत्तमके साथ न तो वार्तालाप करनेका सौभाग्य मिला और न उनके तत्त्वको समझनेका ही। अतएव उन सब देवताओंसे तो अग्नि, वायु और इन्द्र श्रेष्ठ हैं; क्योंकि इन तीनोंको ब्रह्मका दर्शन और तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हुई। परंतु इन्द्रने सबसे पहले उनके तत्त्वको समझा, इसलिये इन्द्र सबसे श्रेष्ठ माने गये॥ ३॥

सम्बन्ध—अब उपर्युक्त ब्रह्मतत्त्वको आधिदैविक दृष्टान्तके द्वारा संकेतसे समझाते हैं—

तस्यैष आदेशो यदेतद् विद्युतो व्यद्युतदा इतीन्म्यमीमिषदा इत्यधिदैवतम् ॥ ४ ॥

तस्य=उस ब्रह्मका; एषः=यह; आदेशः=सांकेतिक उपदेश है; यत्=जो कि; एतत्=यह; विद्युतः=बिजलीका; व्यद्युतत् आ=चमकना-सा है; इति=इस प्रकार (क्षणस्थायी) है; इत्=तथा जो; न्यमीमिषत् आ=नेत्रोंका झपकना-सा है; इति=इस प्रकार; अधिदैवतम्=यह आधिदैविक उपदेश है॥ ४॥

व्याख्या—जब साधकके हृदयमें ब्रह्मको साक्षात् करनेकी तीव्र अभिलाषा जाग उठती है, तब भगवान् उसकी उत्कण्ठाको और भी तीव्रतम तथा उत्कट