ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 56, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें५४ ईशादि नौ उपनिषद् [ खण्ड २
**व्याख्या—**प्राणके द्वारा जो कोई भी चेष्टायुक्त की जानेवाली वस्तु है, तथा प्राकृत प्राणसे अनुप्राणित जिस तत्त्वकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप नहीं है। परब्रह्म परमेश्वर उससे सर्वथा अतीत है। उसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जो प्राणका ज्ञाता, प्रेरक और उसमें शक्ति देनेवाला है, जिसकी शक्तिके किसी अंशको प्राप्त करके और जिसकी प्रेरणासे यह प्रधान प्राण सबको चेष्टायुक्त करनेमें समर्थ होता है, वही सर्वशक्तिमान् परमेश्वर ब्रह्म है। इस मन्त्रमें ‘जिसकी प्रेरणासे प्राण विचरता है, वह कौन है?’ इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है।
सारांश यह कि प्राकृत मन तथा इन्द्रियोंसे जिन विषयोंकी उपलब्धि होती है, वे सभी प्राकृत होते हैं; अतएव उनको परब्रह्म परमेश्वर परात्पर पुरुषोत्तमका वास्तविक स्वरूप नहीं माना जा सकता। इसलिये उनकी उपासना भी परब्रह्म परमेश्वरकी उपासना नहीं है। मन-बुद्धि आदिसे अतीत परब्रह्म परमेश्वरके स्वरूपको सांकेतिक भाषामें समझानेके लिये ही यहाँ गुरुने इन सबके ज्ञाता, शक्तिप्रदाता, स्वामी, प्रेरक, प्रवर्तक, सर्वशक्तिमान्, नित्य, अप्राकृत परम तत्त्वको ब्रह्म बतलाया है॥८॥
प्रथम खण्ड समाप्त॥ १ ॥
द्वितीय खण्ड
यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि
नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम्।
यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु
मीमाꣳस्यमेव ते मन्ये विदितम्॥ १॥
यदि=यदि; त्वम्=तू; इति=यह; मन्यसे=मानता है (कि); सुवेद=(मैं ब्रह्मको) भलीभाँति जान गया हूँ; अपि=तो; नूनम्=निश्चय ही; ब्रह्मणः=ब्रह्मका; रूपम्=स्वरूप;