भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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खण्ड २ ] केनोपनिषद् ५५


दभ्रम्=थोड़ा-सा; एव=ही; (तू) वेत्थ=जानता है; (क्योंकि) अस्य=इस (परब्रह्म परमेश्वर)-का; यत्=जो (आंशिक) स्वरूप; त्वम्=तू है; (और) अस्य=इसका; यत्=जो (आंशिक) स्वरूप; देवेषु=देवताओंमें है; [तत् अल्पम् एव=वह सब मिलकर भी अल्प ही है;] अथ नु=इसीलिये; मन्ये=मैं मानता हूँ कि; ते विदितम्=तेरा जाना हुआ (स्वरूप); मीमांस्यम् एव=निस्संदेह विचारणीय है॥ १॥

व्याख्या—इस मन्त्रमें गुरु अपने शिष्यको सावधान करते हुए कहते हैं कि 'हमारे द्वारा संकेतसे बतलाये हुए ब्रह्मतत्त्वको सुनकर यदि तू ऐसा मानता है कि मैं उस ब्रह्मको भलीभाँति जान गया हूँ तो यह निश्चित है कि तूने ब्रह्मके स्वरूपको बहुत थोड़ा जाना है; क्योंकि उस परब्रह्मका अंशभूत जो जीवात्मा है, उसीको अथवा समस्त देवताओंमें—यानी मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय आदिमें जो ब्रह्मका अंश है, जिससे वे अपना काम करनेमें समर्थ हो रहे हैं, उसको यदि तू ब्रह्म समझता है तो तेरा यह समझना यथार्थ नहीं है। ब्रह्म इतना ही नहीं है। इस जीवात्माको और समस्त विश्व-ब्रह्माण्डमें व्याप्त जो ब्रह्मकी शक्ति है, उस सबको मिलाकर भी देखा जाय तो वह ब्रह्मका एक अंश ही है। अतएव तेरा समझा हुआ यह ब्रह्मतत्त्व तेरे लिये पुनः विचारणीय है, ऐसा मैं मानता हूँ'॥ १॥

सम्बन्धगुरुदेवके उपदेशपर गम्भीरतापूर्वक विचार करनेके अनन्तर शिष्य उनके सामने अपना विचार प्रकट करता है—

नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च । यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च॥ २॥

अहम्=मैं; सुवेद=ब्रह्मको भलीभाँति जान गया हूँ; इति न मन्ये=यों नहीं मानता; (और) नो=न; इति=ऐसा (ही मानता हूँ कि); न वेद=नहीं जानता; (क्योंकि) वेद च=जानता भी हूँ; (किंतु यह जानना विलक्षण है) नः=हम शिष्योंमेंसे; यः=जो कोई भी; तत्=उस ब्रह्मको; वेद=जानता है; तत्=(वही) मेरे उक्त वचनके अभिप्रायको; =भी; वेद=जानता है; (कि) वेद=मैं जानता हूँ; (और) न वेद=नहीं जानता; इति=ये दोनों ही; नो=नहीं हैं॥ २॥