भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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खण्ड १ ] केनोपनिषद् ५३


जाननेमें प्रवृत्त करनेवाला है तथा जिसकी शक्तिके किसी अंशका यह प्रभाव है वह ब्रह्म है। इस मन्त्रमें 'जिसकी शक्ति और प्रेरणासे चक्षु अपने विषयोंको देखता है, वह कौन है?' इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है॥ ६॥

यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदग्ं श्रुतम्।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥ ७॥

यत्=जिसको (कोई भी); श्रोत्रेण=श्रोत्रके द्वारा; =नहीं; शृणोति=सुन सकता; [अपि तु=बल्कि;] येन=जिससे; इदम्=यह; श्रोत्रम्=श्रोत्र-इन्द्रिय; श्रुतम्=सुनी हुई है; तत्=उसको; एव=ही; त्वम्=तू; ब्रह्म=ब्रह्म; विद्धि=जान; इदम् यत्=श्रोत्र-इन्द्रियके द्वारा जाननेमें आनेवाले जिस तत्त्वकी; उपासते=(लोग) उपासना करते हैं; इदम्=यह; =ब्रह्म नहीं है॥ ७॥

व्याख्या— जो कुछ भी सुननेमें आनेवाला पदार्थ है तथा प्राकृत कानोंसे सुने जानेवाले जिस वस्तु-समुदायकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप नहीं है। परब्रह्म परमेश्वर श्रोत्रेन्द्रियसे सर्वथा अतीत है। उसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जो श्रोत्र-इन्द्रियका ज्ञाता, प्रेरक और उसमें सुननेकी शक्ति देनेवाला है तथा जिसकी शक्तिके किसी अंशसे श्रोत्र-इन्द्रियमें शब्दोंको ग्रहण करनेकी सामर्थ्य आयी है, वह ब्रह्म है। इस मन्त्रमें 'जिसकी शक्ति और प्रेरणासे श्रोत्र अपने विषयोंको सुननेमें प्रवृत्त होता है, वह कौन है?' इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है॥ ७॥

यत् प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥ ८॥

यत्=जो; प्राणेन=प्राणके द्वारा; न प्राणिति=चेष्टायुक्त नहीं होता; [अपि तु=बल्कि; ] येन=जिससे; प्राणः=प्राण; प्रणीयते=चेष्टायुक्त होता है; तत्=उसको; एव=ही; त्वम्=तू; ब्रह्म=ब्रह्म; विद्धि=जान; इदम् यत्=प्राणोंकी शक्तिसे चेष्टायुक्त दीखनेवाले जिस तत्त्व-समुदायकी; उपासते=(लोग) उपासना करते हैं; इदम्=यह; =ब्रह्म नहीं है॥ ८॥