भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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५२ ईशादि नौ उपनिषद् [ खण्ड १

एव = ही; त्वम् = तू; ब्रह्म = ब्रह्म; विद्धि = जान; इदम् यत् = मन और बुद्धिके द्वारा जाननेमें आनेवाले जिस तत्त्वकी; उपासते = (लोग) उपासना करते हैं; इदम् = यह; न = ब्रह्म नहीं है॥ ५॥

**व्याख्या—**बुद्धि और मनका जो कुछ भी विषय है, जो इनके द्वारा जाननेमें आ सकता है तथा प्राकृत मन-बुद्धिसे जाने हुए जिस तत्त्वकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप नहीं है। परब्रह्म परमेश्वर मन और बुद्धिसे सर्वथा अतीत है। इसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जो मन-बुद्धिका ज्ञाता, उनको मनन और निश्चय करनेकी शक्ति देनेवाला तथा मनन और निश्चय करनेमें नियुक्त करनेवाला है तथा जिसकी शक्तिके किसी अंशसे बुद्धिमें निश्चय करनेकी और मनमें मनन करनेकी सामर्थ्य आयी है, वह ब्रह्म है। इस मन्त्रमें ‘जिसकी शक्ति और प्रेरणाको पाकर मन अपने ज्ञेय पदार्थोंको जानता है, वह कौन है?’ इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है॥ ५॥

यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥ ६॥

यत् = जिसको (कोई भी); चक्षुषा = चक्षुके द्वारा; = नहीं; पश्यति = देख सकता; [अपि तु = बल्कि;] येन = जिससे; चक्षूंषि = चक्षु; (अपने विषयोंको) पश्यति = देखता है; तत् = उसको; एव = ही; त्वम् = तू; ब्रह्म = ब्रह्म; विद्धि = जान; इदम् यत् = चक्षुके द्वारा देखनेमें आनेवाले जिस दृश्यवर्गकी; उपासते = (लोग) उपासना करते हैं; इदम् = यह; = ब्रह्म नहीं है॥ ६॥

**व्याख्या—**चक्षुका जो कुछ भी विषय है, जो इसके द्वारा देखने-जाननेमें आ सकता है तथा प्राकृत आँखोंसे देखे जानेवाले जिस पदार्थसमूहकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक रूप नहीं है। परब्रह्म परमेश्वर चक्षु आदि इन्द्रियोंसे सर्वथा अतीत है। उसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जिसकी शक्ति और प्रेरणासे चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने विषयको प्रत्यक्ष करनेमें समर्थ होती हैं, जो इनको जाननेवाला और इन्हें अपने विषयोंको