ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 53, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] केनोपनिषद् ५१
जड-वर्ग (क्षर) से तो वह सर्वथा भिन्न है और इस जड-वर्गको जाननेवाले परंतु स्वयं जाननेमें न आनेवाले जीवात्मा (अक्षर) से भी उत्तम है। ऐसी स्थितिमें उसके स्वरूपतत्त्वको वाणीके द्वारा व्यक्त करना कदापि सम्भव नहीं है। इसीसे उसको समझानेके लिये संकेतका ही आश्रय लेना पड़ता है [गीता १५।१८] ॥ ३ ॥
सम्बन्ध— अब उसी ब्रह्मको प्रश्नोंके अनुसार पुनः पाँच मन्त्रोंमें समझाते हैं—
यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ४ ॥
यत् = जो; वाचा = वाणीके द्वारा; अनभ्युदितम् = नहीं बतलाया गया है; [अपि तु = बल्कि;] येन = जिससे; वाक् = वाणी; अभ्युद्यते = बोली जाती है अर्थात् जिसकी शक्तिसे वक्ता बोलनेमें समर्थ होता है; तत् = उसको; एव = ही; त्वम् = तू; ब्रह्म = ब्रह्म; विद्धि = जान; इदम् यत् = वाणीके द्वारा बतानेमें आनेवाले जिस तत्त्वकी; उपासते = (लोग) उपासना करते हैं; इदम् = यह; न = ब्रह्म नहीं है ॥ ४ ॥
व्याख्या— वाणीके द्वारा जो कुछ भी व्यक्त किया जा सकता है तथा प्राकृत वाणीसे बतलाये हुए जिस तत्त्वकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्मका वास्तविक स्वरूप नहीं है। ब्रह्मतत्त्व वाणीसे सर्वथा अतीत है। उसके विषयमें केवल इतना ही कहा जा सकता है कि जिसकी शक्तिके किसी अंशसे वाणीमें प्रकाशित होनेकी—बोलनेकी शक्ति आयी है, जो वाणीका भी ज्ञाता, प्रेरक और प्रवर्तक है, वह ब्रह्म है। इस मन्त्रमें 'जिसकी प्रेरणासे वाणी बोली जाती है, वह कौन है?' इस प्रश्नका उत्तर दिया गया है ॥ ४ ॥
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ५ ॥
यत् = जिसको; (कोई भी) मनसा = मनसे (अन्तःकरणके द्वारा); न = नहीं; मनुते = समझ सकता; [अपि तु = बल्कि;] येन = जिससे; मनः = मन; मतम् = (मनुष्यका) जाना हुआ हो जाता है; आहुः = ऐसा कहते हैं; तत् = उसको;