ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 63, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ३ ] केनोपनिषद् ६१
रखते हैं और सर्वज्ञ-से हैं। इसीसे उनका गौरवयुक्त नाम 'जातवेदा' है। देवताओंने इस कार्यके लिये अग्निको ही उपयुक्त समझा और उन्होंने कहा—'हे जातवेदा! आप जाकर इस यक्षका पूरा पता लगाइये कि यह कौन है।' अग्निदेवताको अपनी बुद्धि-शक्तिका गर्व था। अतः उन्होंने कहा—'अच्छी बात है, अभी पता लगाता हूँ'॥ ३॥
तदभ्यद्रवत् तमभ्यवदत् कोऽसीत्यग्निर्वा अहमस्मीत्यब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति ॥ ४ ॥
तत्=उसके समीप; (अग्निदेव) अभ्यद्रवत्=दौड़कर गया; तम्=उस अग्निदेवसे; अभ्यवदत्=(उस दिव्य यक्षने) पूछा; कः असि इति=(कि तुम) कौन हो; अब्रवीत्=(अग्निने) यह कहा (कि); अहम्=मैं; वै अग्निः=प्रसिद्ध अग्निदेव; अस्मि इति=हूँ; (और) अहम् वै=मैं ही; जातवेदाः=जातवेदाके नामसे; अस्मि इति=प्रसिद्ध हूँ॥ ४॥
**व्याख्या—**अग्निदेवताने सोचा, इसमें कौन बड़ी बात है; इसलिये वे तुरंत यक्षके समीप जा पहुँचे। उन्हें अपने समीप खड़ा देखकर यक्षने पूछा—आप कौन हैं? अग्निने सोचा—मेरे तेजःपुञ्ज स्वरूपको सभी पहचानते हैं, इसने कैसे नहीं जाना; अतः उन्होंने तमककर उत्तर दिया—'मैं प्रसिद्ध अग्नि हूँ, मेरा ही गौरवमय और रहस्यपूर्ण नाम जातवेदा है'॥ ४॥
**सम्बन्ध—**तब यक्षरूपी ब्रह्मने अग्निसे पूछा—
तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमिति। अपीदꣳसर्वं दहेयम्, यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ५ ॥
तस्मिन् त्वयि=उक्त नामोंवाले तुझ अग्निमें; किं वीर्यम्=क्या सामर्थ्य है; इति=यह बता; (तब अग्निने यह उत्तर दिया कि) अपि=यदि (मैं चाहूँ तो); पृथिव्याम्=पृथ्वीमें; यत् इदम्=यह जो कुछ भी है; इदम् सर्वम्=इस सबको; दहेयम् इति=जलाकर भस्म कर दूँ॥ ५॥
**व्याख्या—**अग्निकी गर्वोक्ति सुनकर ब्रह्मने अनजानकी भाँति कहा—