ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 64, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें६२ ईशादि नौ उपनिषद् [ खण्ड ३
'अच्छा! आप अग्निदेवता हैं और जातवेदा—सबका ज्ञान रखनेवाले भी आप ही हैं? बड़ी अच्छी बात है, पर यह तो बताइये कि आपमें क्या शक्ति है; आप क्या कर सकते हैं? इसपर अग्निने पुनः सगर्व उत्तर दिया—'मैं क्या कर सकता हूँ' इसे आप जानना चाहते हैं? अरे, मैं चाहूँ तो इस सारे भूमण्डलमें जो कुछ भी देखनेमें आ रहा है, सबको जलाकर अभी राखका ढेर कर दूँ' ॥ ५॥
तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति। तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते, नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद् यक्षमिति॥ ६॥
(तब उस दिव्य यक्षने) तस्मै=उस अग्निदेवके सामने; तृणम्=एक तिनका; निदधौ=रख दिया; (और) इति=यह कहा कि; एतत्=इस तिनकेको; दह= जला दो; सः=वह (अग्नि); सर्वजवेन=पूर्ण शक्ति लगाकर; तत् उपप्रेयाय= उस तिनकेपर टूट पड़ा (परंतु); तत्=उसको; दग्धुम्=जलानेमें; न एव शशाक=किसी प्रकार समर्थ नहीं हुआ; ततः=(तब लज्जित होकर) वहाँसे; निववृते=लौट गया (और देवताओंसे बोला); एतत्=यह; विज्ञातुम्=जाननेमें; न अशकम्=मैं समर्थ नहीं हो सका (कि वस्तुतः); एतत्=यह; यक्षम्=दिव्य यक्ष; यत् इति=कौन है॥ ६॥
व्याख्या—अग्निदेवताकी पुनः गर्वोक्ति सुनकर सबको सत्ताशक्ति देनेवाले यक्षरूपी परब्रह्म परमेश्वरने उनके आगे एक सूखा तिनका डालकर कहा— 'आप तो सभीको जला सकते हैं; तनिक-सा बल लगाकर इस सूखे तृणको जला दीजिये।' अग्निदेवताने मानो इसको अपना अपमान समझा और वे सहज ही उस तृणके पास पहुँचे और उसे जलाना चाहा; जब नहीं जला तब उन्होंने उसे जलानेके लिये अपनी पूरी शक्ति लगा दी। पर उसको तनिक- सी आँच भी नहीं लगी। आँच लगती कैसे? अग्निमें जो अग्नित्व है—दाहिका शक्ति है, वह तो शक्तिके मूलभण्डार परमात्मासे ही मिली हुई है। वे यदि उस शक्तिस्रोतको रोक दें तो फिर शक्ति कहाँसे आयेगी। अग्निदेव इस बातको न समझकर ही डींग हाँक रहे थे। पर जब ब्रह्मने अपनी शक्तिको रोक