भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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खण्ड ३ ] केनोपनिषद् ६३

लिया, सूखा तिनका नहीं जल सका, तब तो उनका सिर लज्जासे झुक गया और वे हतप्रतिज्ञ और हतप्रभ होकर चुपचाप देवताओंके पास लौट आये और बोले कि 'मैं तो भलीभाँति नहीं जान सका कि यह यक्ष कौन है'॥ ६ ॥

अथ वायुमब्रुवन् वायवेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति तथेति ॥ ७ ॥

अथ=तब; वायुम्=वायुदेवतासे; अब्रुवन्=(देवताओंने) कहा; वायो=हे वायुदेव! (जाकर); एतत्=इस बातको; विजानीहि=आप जानिये—इसका भलीभाँति पता लगाइये (कि); एतत्=यह; यक्षम्=दिव्य यक्ष; किम् इति=कौन है; (वायुने कहा) तथा इति=बहुत अच्छा!॥ ७॥

**व्याख्या—**जब अग्निदेव असफल होकर लौट आये, तब देवताओंने इस कार्यके लिये अप्रतिमशक्ति वायुदेवको चुना और उनसे कहा कि 'वायुदेव! आप जाकर इस यक्षका पूरा पता लगाइये कि यह कौन है।' वायुदेवको भी अपनी बुद्धि-शक्तिका गर्व था; अतः उन्होंने भी कहा—'अच्छी बात है, अभी पता लगाता हूँ'॥ ७॥

तदभ्यद्रवत् तमभ्यवदत् कोऽसीति। वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति ॥ ८ ॥

तत्=उसके समीप; अभ्यद्रवत्=(वायुदेवता) दौड़कर गया; तम्=उससे (भी); अभ्यवदत्=(उस दिव्य यक्षने) पूछा; कः असि इति=(कि तुम) कौन हो; अब्रवीत्=(तब वायुने) यह कहा (कि); अहम्=मैं; वै वायुः=प्रसिद्ध वायुदेव; अस्मि इति=हूँ; (और) अहम् वै=मैं ही; मातरिश्वा=मातरिश्वाके नामसे; अस्मि इति=प्रसिद्ध हूँ॥ ८॥

**व्याख्या—**वायुदेवताने सोचा, 'अग्नि कहीं भूल कर गये होंगे; नहीं तो यक्षका परिचय जानना कौन बड़ी बात थी। अस्तु, इस सफलताका श्रेय मुझको मिलेगा।' यह सोचकर वे तुरंत यक्षके समीप जा पहुँचे। उन्हें अपने