ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 66, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें६४ ईशादि नौ उपनिषद् [ खण्ड ३
समीप खड़ा देखकर यक्षने पूछा—'आप कौन हैं? वायुने भी अपने गुण-गौरवके गर्वसे तमककर उत्तर दिया 'मैं प्रसिद्ध वायु हूँ, मेरा ही गौरवमय और रहस्यपूर्ण नाम मातरिश्वा है'॥८॥
सम्बन्ध— यक्षरूपी ब्रह्मने वायुसे पूछा—
तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमिति ? अपीद ूँ सर्वमाददीयम्, यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ९॥
तस्मिन् त्वयि = उक्त नामोंवाले तुझ वायुमें; किं वीर्यम् = क्या सामर्थ्य है; इति = यह बता; (तब वायुने यह उत्तर दिया कि) अपि = यदि (मैं चाहूँ तो); पृथिव्याम् = पृथ्वीमें; यत् इदम् = यह जो कुछ भी है; इदम् सर्वम् = इस सबको; आददीयम् इति = उठा लूँ—आकाशमें उड़ा दूँ॥९॥
व्याख्या— वायुकी भी वैसी ही गर्वोक्ति सुनकर ब्रह्मने इनसे भी वैसे ही अनजानकी भाँति कहा—'अच्छा! आप वायुदेवता हैं और मातरिश्वा—अन्तरिक्षमें बिना ही आधारके विचरण करनेवाले भी आप ही हैं? बड़ी अच्छी बात है! पर यह तो बताइये कि आपमें क्या शक्ति है—आप क्या कर सकते हैं? इसपर वायुने भी अग्निकी भाँति पुनः सगर्व उत्तर दिया कि 'मैं चाहूँ तो इस सारे भूमण्डलमें जो कुछ भी देखनेमें आ रहा है, सबको बिना आधारके उठा लूँ—उड़ा दूँ'॥९॥
तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति। तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाकादातुं स तत एव निववृते, नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद् यक्षमिति ॥ १०॥
(तब उस दिव्य यक्षने) तस्मै = उस वायुदेवके सामने; तृणम् = एक तिनका; निदधौ = रख दिया; (और यह कहा कि) एतत् = इस तिनकेको; आदत्स्व इति = उठा लो—उड़ा दो; सः = वह (वायु); सर्वजवेन = पूर्ण शक्ति लगाकर; तत् उपप्रेयाय = उस तिनकेपर झपटा (परंतु); तत् = उसको; आदातुम् = उड़ानेमें; न एव शशाक = किसी प्रकार भी समर्थ नहीं हुआ; ततः = (तब लज्जित होकर) वहाँसे;