ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 67, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ३ ] केनोपनिषद् ६५
निववृते=लौट गया (और देवताओंसे बोला) एतत्=यह; विज्ञातुम्=जाननेमें; न अशकम्=मैं समर्थ नहीं हो सका (कि वस्तुतः); एतत्=यह; यक्षम्=दिव्य यक्ष; यत् इति=कौन है॥ १०॥
व्याख्या—वायुदेवताकी भी पुनः वैसी ही गर्वोक्ति सुनकर सबको सत्ता- शक्ति देनेवाले परब्रह्म परमेश्वरने उनके आगे भी एक सूखा तिनका डालकर कहा—'आप तो सभीको उड़ा सकते हैं, तनिक-सा बल लगाकर इस सूखे तृणको उड़ा दीजिये।' वायुदेवताने भी मानो इसको अपना अपमान समझा और वे सहज ही उस तृणके पास पहुँचे, उसे उड़ाना चाहा; जब नहीं उड़ा तब उन्होंने अपनी पूरी शक्ति लगा दी। परंतु शक्तिमान् परमात्माके द्वारा शक्ति रोक लिये जानेके कारण वे उसे तनिक-सा हिला भी नहीं सके और अग्निकी ही भाँति हतप्रतिज्ञ और हतप्रभ होकर लज्जासे सिर झुकाये वहाँसे लौट आये एवं देवताओंसे बोले कि 'मैं तो भलीभाँति नहीं जान सका कि यह यक्ष कौन है?'॥ १०॥
अथेन्द्रमब्रुवन् मघवन्नेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति । तथेति । तदभ्यद्रवत् । तस्मात् तिरोदधे ॥ ११ ॥
अथ=तदनन्तर; इन्द्रम्=इन्द्रसे; अब्रुवन्=(देवताओंने) यह कहा; मघवन्=हे इन्द्रदेव !; एतत्=इस बातको; विजानीहि=आप जानिये—भलीभाँति पता लगाइये (कि); एतत्=यह; यक्षम्=दिव्य यक्ष; किम् इति=कौन है; (तब इन्द्रने कहा) तथा इति=बहुत अच्छा; तत् अभ्यद्रवत्=(और वे) उस यक्षकी ओर दौड़कर गये (परंतु वह दिव्य यक्ष); तस्मात्=उनके सामनेसे; तिरोदधे=अन्तर्धान हो गया ॥ ११ ॥
व्याख्या—जब अग्नि और वायु-सरीखे अप्रतिमशक्ति और बुद्धिसम्पन्न देवता असफल होकर लौट आये और उन्होंने कोई कारण भी नहीं बताया, तब देवताओंने विचार करके स्वयं देवराज इन्द्रको इस कार्यके लिये चुना और उन्होंने कहा—'हे महान् बलशाली देवराज ! अब आप ही जाकर पूरा पता लगाइये कि यह यक्ष कौन है। आपके सिवा अन्य किसीके इस काममें सफल होनेकी सम्भावना नहीं है।' इन्द्र 'बहुत अच्छा' कहकर तुरंत यक्षके पास गये;