भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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६६ ईशादि नौ उपनिषद् [ खण्ड ३

पर उनके यहाँ पहुँचते ही वह उनके सामनेसे अन्तर्धान हो गया। इन्द्रमें इन देवताओंसे अधिक अभिमान था; इसलिये ब्रह्मने उनको वार्तालापका अवसर नहीं दिया। परंतु इस एक दोषके अतिरिक्त अन्य सब प्रकारसे इन्द्र अधिकारी थे, अतः उन्हें ब्रह्मतत्त्वका ज्ञान कराना आवश्यक समझकर इसीकी व्यवस्थाके लिये वे स्वयं अन्तर्धान हो गये ॥ ११ ॥

स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमाँहैमवतीं ताँहोवाच किमेतद् यक्षमिति ॥ १२ ॥

सः=वे इन्द्र; तस्मिन् एव=उसी; आकाशे=आकाशप्रदेशमें (यक्षके स्थानपर ही); बहुशोभमानाम्=अतिशय सुन्दरी; स्त्रियम्=देवी; हैमवतीम्=हिमाचलकुमारी; उमाम्=उमाके पास; आजगाम=आ पहुँचे (और); ताम्=उनसे; ह उवाच=(सादर) यह बोले (देवि!); एतत्=यह; यक्षम्=दिव्य यक्ष; किम् इति=कौन था ॥ १२ ॥

**व्याख्या—**यक्षके अन्तर्धान हो जानेपर इन्द्र वहीं खड़े रहे, अग्नि-वायुकी भाँति वहाँसे लौटे नहीं। इतनेहीमें उन्होंने देखा कि जहाँ दिव्य यक्ष था, ठीक उसी जगह अत्यन्त शोभामयी हिमाचलकुमारी उमादेवी प्रकट हो गयी हैं। उन्हें देखकर इन्द्र उनके पास चले गये। इन्द्रपर कृपा करके करुणामय परब्रह्म पुरुषोत्तमने ही उमारूपा साक्षात् ब्रह्मविद्याको प्रकट किया था। इन्द्रने भक्तिपूर्वक उनसे कहा—‘भगवती ! आप सर्वज्ञशिरोमणि ईश्वर श्रीशङ्करकी स्वरूपा-शक्ति हैं। अतः आपको अवश्य ही सब बातोंका पता है। कृपापूर्वक मुझे बतलाइये कि यह दिव्य यक्ष, जो दर्शन देकर तुरंत ही छिप गया, वस्तुतः कौन है और किस हेतुसे यहाँ प्रकट हुआ था’॥ १२ ॥

तृतीय खण्ड समाप्त ॥ ३ ॥