ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 62, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें६० ईशादि नौ उपनिषद् [ खण्ड ३
तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानत किमिदं यक्षमिति ॥ २ ॥
ह तत्=प्रसिद्ध है कि उस परब्रह्मने; एषाम्=इन देवताओंके (अभिमानको); विजज्ञौ=जान लिया; (और कृपापूर्वक उनका अभिमान नष्ट करनेके लिये वह) तेभ्यः=उनके सामने; ह=ही; प्रादुर्बभूव=साकाररूपमें प्रकट हो गया; तत्=उसको (यक्षरूपमें प्रकट हुआ देखकर भी); इदम्=यह; यक्षम्=दिव्य यक्ष; किम् इति=कौन है, इस बातको; न व्यजानत= (देवताओंने) नहीं जाना ॥ २ ॥
व्याख्या—देवताओंके मिथ्या अभिमानको करुणावरुणालय भगवान् समझ गये। भक्त-कल्याणकारी भगवान्ने सोचा कि यह अभिमान बना रहा तो इनका पतन हो जायगा। भक्त-सुहृद् भगवान् भक्तोंका पतन कैसे सह सकते थे। अतः देवताओंपर कृपा करके उनका दर्प चूर्ण करनेके लिये वे उनके सामने दिव्य साकार यक्षरूपमें प्रकट हो गये। देवता आश्चर्यचकित होकर उस अत्यन्त अद्भुत विशाल रूपको देखने और विचार करने लगे कि यह दिव्य यक्ष कौन है; पर वे उसको पहचान नहीं सके ॥ २ ॥
तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेद एतद् विजानीहि किमिदं यक्षमिति तथेति ॥ ३ ॥
ते=उन इन्द्रादि देवताओंने; अग्निम्=अग्निदेवसे; [इति=इस प्रकार;] अब्रुवन्=कहा; जातवेदः=हे जातवेदा; (आप जाकर) एतत्=इस बातको; विजानीहि=जानिये—इसका भलीभाँति पता लगाइये (कि); इदम् यक्षम्=यह दिव्य यक्ष; किम् इति=कौन है; तथा इति=(अग्निने कहा—) बहुत अच्छा ! ॥ ३ ॥
व्याख्या—देवता उस अति विचित्र महाकाय दिव्य यक्षको देखकर मन-ही-मन सहम-से गये और उसका परिचय जाननेके लिये व्यग्र हो उठे। अग्निदेवता परम तेजस्वी हैं, वेदार्थके ज्ञाता हैं; समस्त जात-पदार्थोंका पता