ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 71, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ४ ] केनोपनिषद् ६१
अत्यन्त प्रिय और समीपस्थ परमेश्वरको; पस्पर्श=(उमादेवीसे सुनकर सबसे पहले) मनके द्वारा स्पर्श किया; स हि=(और) उसीने; एनत्=इनको; प्रथमः=अन्यान्य देवताओंसे पहले; विदाञ्चकार=भलीभाँति जाना है (कि); ब्रह्म इति=ये साक्षात् परब्रह्म पुरुषोत्तम हैं॥ ३ ॥
व्याख्या—अग्नि तथा वायुने दिव्य यक्षके रूपमें ब्रह्मका दर्शन और उसके साथ वार्तालापका सौभाग्य तो प्राप्त किया था; परंतु उन्हें उसके स्वरूपका ज्ञान नहीं हुआ था। भगवती उमाके द्वारा सबसे पहले देवराज इन्द्रको सर्वशक्तिमान् परब्रह्म पुरुषोत्तमके तत्त्वका ज्ञान हुआ। तदनन्तर इन्द्रके बतलानेपर अग्नि और वायुको उनके स्वरूपका पता लगा और उसके बाद इनके द्वारा अन्य सब देवताओंने यह जाना कि हमें जो दिव्य यक्ष दिखलायी दे रहे थे, वे साक्षात् परब्रह्म पुरुषोत्तम ही हैं। इस प्रकार अन्यान्य देवताओंने केवल सुनकर जाना; परंतु उन्हें परब्रह्म पुरुषोत्तमके साथ न तो वार्तालाप करनेका सौभाग्य मिला और न उनके तत्त्वको समझनेका ही। अतएव उन सब देवताओंसे तो अग्नि, वायु और इन्द्र श्रेष्ठ हैं; क्योंकि इन तीनोंको ब्रह्मका दर्शन और तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हुई। परंतु इन्द्रने सबसे पहले उनके तत्त्वको समझा, इसलिये इन्द्र सबसे श्रेष्ठ माने गये॥ ३॥
सम्बन्ध—अब उपर्युक्त ब्रह्मतत्त्वको आधिदैविक दृष्टान्तके द्वारा संकेतसे समझाते हैं—
तस्यैष आदेशो यदेतद् विद्युतो व्यद्युतदा इतीन्म्यमीमिषदा इत्यधिदैवतम् ॥ ४ ॥
तस्य=उस ब्रह्मका; एषः=यह; आदेशः=सांकेतिक उपदेश है; यत्=जो कि; एतत्=यह; विद्युतः=बिजलीका; व्यद्युतत् आ=चमकना-सा है; इति=इस प्रकार (क्षणस्थायी) है; इत्=तथा जो; न्यमीमिषत् आ=नेत्रोंका झपकना-सा है; इति=इस प्रकार; अधिदैवतम्=यह आधिदैविक उपदेश है॥ ४॥
व्याख्या—जब साधकके हृदयमें ब्रह्मको साक्षात् करनेकी तीव्र अभिलाषा जाग उठती है, तब भगवान् उसकी उत्कण्ठाको और भी तीव्रतम तथा उत्कट