ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 72, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ खण्ड ४ ]
बनानेके लिये बिजलीके चमकने और आँखोंके झपकनेकी भाँति अपने स्वरूपकी क्षणिक झाँकी दिखलाकर छिप जाया करते हैं। पूर्वोक्त आख्यायिकामें इसी प्रकार इन्द्रके सामनेसे दिव्य यक्षके अन्तर्धान हो जानेकी बात आयी है। देवर्षि नारदको भी उनके पूर्वजन्ममें क्षणभरके लिये अपनी दिव्य झाँकी दिखलाकर भगवान् अन्तर्धान हो गये थे। यह कथा श्रीमद्भागवत (१। ६। १९-२०) में आती है। जब साधकके नेत्रोंके सामने या उसके हृदय-देशमें पहले-पहले भगवान्के साकार या निराकार स्वरूपका दर्शन या अनुभव होता है, तब वह आनन्दाश्रयसे चकित-सा हो जाता है। इससे उसके हृदयमें अपने आराध्यदेवको नित्य-निरन्तर देखते रहने या अनुभव करते रहनेकी अनिवार्य और परम उत्कट अभिलाषा उत्पन्न हो जाती है। फिर उसे क्षणभरके लिये भी इष्ट-साक्षात्कारके बिना शान्ति नहीं मिलती। यही बात इस मन्त्रमें आधिदैविक उदाहरणसे समझायी गयी है—ऐसा प्रतीत होता है। वस्तुतः यहाँ बड़ी ही गोपनीय रीतिसे ऐसे शब्दोंमें ब्रह्मत्वका संकेत किया गया है कि जिसे कोई अनुभवी संत-महात्मा ही बतला सकते हैं। शब्दोंका अर्थ तो अपनी-अपनी भावनाके अनुसार विभिन्न प्रकारसे लगाया जा सकता है ॥४॥
सम्बन्ध— अब इसी बातको आध्यात्मिक भावसे समझाते हैं—
अथाध्यात्मं यदेतद्ब्रह्मतीव च मनोऽनेन चैतदुपस्मरत्यभीक्षणः संकल्पः ॥ ५ ॥
अथ=अब; अध्यात्मम्=आध्यात्मिक (उदाहरण दिया जाता है); यत्= जो कि; मनः=(हमारा) मन; एतत्=इस (ब्रह्म) के समीप; गच्छति इव=जाता हुआ-सा प्रतीत होता है; च=तथा; एतत्=इस ब्रह्मको; अभीक्षणम्=निरन्तर; उपस्मरति=अतिशय प्रेमपूर्वक स्मरण करता है; अनेन= इस मनके द्वारा (ही); संकल्पः=च=संकल्प अर्थात् उस ब्रह्मके साक्षात्कारकी उत्कट अभिलाषा भी (होती है) ॥५॥
व्याख्या— जब साधकको अपना मन आराध्यदेव श्रीभगवान्के समीपतक