ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 73, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ४ ] केनोपनिषद् ७१
पहुँचता हुआ-सा दीखता है, वह अपने मनसे भगवान्के निर्गुण या सगुण—जिस स्वरूपका भी चिन्तन करता है, उसकी जब प्रत्यक्ष अनुभूति-सी होती है, तब स्वाभाविक ही उसका अपने उस इष्टमें अत्यन्त प्रेम हो जाता है। फिर वह क्षणभरके लिये भी अपने इष्टदेवकी विस्मृतिको सहन नहीं कर सकता। उस समय वह अतिशय व्याकुल हो जाता है (तद्विस्मरणे परमव्याकुलता, नारदभक्तिसूत्र १९)। वह नित्य-निरन्तर प्रेमपूर्वक उसका स्मरण करता रहता है और उसके मनमें अपने इष्टको प्राप्त करनेकी अनिवार्य और परम उत्कट अभिलाषा उत्पन्न हो जाती है। पिछले मन्त्रमें जो बात आधिदैविक दृष्टिसे कही गयी थी, वही इसमें आध्यात्मिक दृष्टिसे कही गयी है॥ ५॥
सम्बन्ध— अब उस ब्रह्मकी उपासनाका प्रकार और उसका फल बतलाते हैं—
तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यं स य एतदेवं वेदाभि हैनꣳ सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति ॥ ६ ॥
तत्= वह परब्रह्म परमात्मा; तद्वनम्= (प्राणिमात्रका प्रापणीय होनेके कारण) ‘तद्वन’; नाम ह= नामसे प्रसिद्ध है; (अतः) तद्वनम्= वह आनन्दघन परमात्मा प्राणिमात्रकी अभिलाषाका विषय और सबका परम प्रिय है; इति= इस भावसे; उपासितव्यम्= उसकी उपासना करनी चाहिये; सः यः= वह जो भी साधक; एतत्= उस ब्रह्मको; एवम्= इस प्रकार (उपासनाके द्वारा); वेद= जान लेता है; एनम् ह= उसको निःसंदेह; सर्वाणि= सम्पूर्ण; भूतानि= प्राणी; अभि= सब ओरसे; संवाञ्छन्ति= हृदयसे चाहते हैं अर्थात् वह प्राणिमात्रका प्रिय हो जाता है॥ ६॥
व्याख्या— वह आनन्दस्वरूप परब्रह्म परमेश्वर सभीका अत्यन्त प्रिय है। सभी प्राणी किसी-न-किसी प्रकारसे उसीको चाहते हैं, परंतु पहचानते नहीं; इसीलिये वे सुखके रूपमें उसे खोजते हुए दुःखरूप विषयोंमें भटकते रहते हैं, उसे पा नहीं सकते! इस रहस्यको समझकर साधकको चाहिये कि उस परब्रह्म परमात्माको प्राणिमात्रका प्रिय समझकर उसके नित्य अचल अमल अनन्त परम आनन्दस्वरूपका नित्य-निरन्तर चिन्तन करता रहे। ऐसा करते-