ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 74, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ खण्ड ४ ]
करते जब वह आनन्दस्वरूप सर्वप्रिय परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है, तब वह स्वयं भी आनन्दमय हो जाता है। अतः जगत्के सभी प्राणी उसे अपना परम आत्मीय समझकर उसके साथ हृदयसे प्रेम करने लगते हैं ॥ ६ ॥
उपनिषद् भो ब्रूहीत्युक्ता त उपनिषद् ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति ॥ ७ ॥
भोः =हे गुरुदेव; उपनिषदम् =ब्रह्मसम्बन्धी रहस्यमयी विद्याका; ब्रूहि =उपदेश कीजिये; इति =इस प्रकार (शिष्यके प्रार्थना करनेपर गुरुदेव कहते हैं कि); ते =तुझको (हमने); उपनिषत् =रहस्यमयी ब्रह्मविद्या; उक्ता =बतला दी; ते =तुझको (हम); वाव =निश्चय ही; ब्राह्मीम् =ब्रह्मविषयक; उपनिषदम् =रहस्यमयी विद्या; अब्रूम =बतला चुके हैं; इति =इस प्रकार (तुम्हें समझना चाहिये) ॥ ७ ॥
व्याख्या —गुरुदेवसे सांकेतिक भाषामें ब्रह्मविद्याका श्रेष्ठ उपदेश सुनकर शिष्य उसको पूर्णरूपसे हृदयङ्गम नहीं कर सका; इसलिये उसने प्रार्थना की कि ‘भगवन्! मुझे उपनिषद्—रहस्यमयी ब्रह्मविद्याका उपदेश कीजिये।’ इसपर गुरुदेवने कहा—‘वत्स! हम तुम्हें ब्रह्मविद्याका उपदेश कर चुके हैं।’ तुम्हारे प्रश्नके उत्तरमें ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ से लेकर उपर्युक्त मन्त्रतक जो कुछ उपदेश किया है, तुम यह दृढ़रूपसे समझ लो कि वह सुनिश्चित रहस्यमयी ब्रह्मविद्याका ही उपदेश है ॥ ७ ॥
सम्बन्ध —ब्रह्मविद्याके सुननेमात्रसे ही ब्रह्मके स्वरूपका रहस्य समझमें नहीं आता, इसके लिये विशेष साधनोंकी आवश्यकता होती है; इसलिये अब उन प्रधान साधनोंका वर्णन करते हैं—
तस्यै तपो दमः कर्मैति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गनि सत्यमायतनम् ॥ ८ ॥
तस्यै =उस रहस्यमयी ब्रह्मविद्याके; तपः =तपस्या; दमः =मन-इन्द्रियोंका नियन्त्रण; कर्म =कर्तव्यपालन; इति =ये तीनों; प्रतिष्ठा =आधार हैं; वेदाः =वेद; सर्वाङ्गनि =उस विद्याके सम्पूर्ण अङ्ग हैं अर्थात् वेदमें उसके अङ्ग-प्रत्यङ्गोंका