भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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खण्ड ४ ] केनोपनिषद् ७३

सविस्तर वर्णन है; सत्यम्=सत्यस्वरूप परमेश्वर; आयतनम्=उसका अधिष्ठान—प्राप्य है॥ ८ ॥

व्याख्या—सुन-पढ़कर रट लिया और ब्रह्मज्ञानी हो गये, यह तो ब्रह्मविद्याका उपहास है और अपने-आपको धोखा देना है। ब्रह्मविद्यारूपी प्रासादकी नींव हैं—तप, दम और कर्म आदि साधन। इन्हींपर वह रहस्यमयी ब्रह्मविद्या स्थिर हो सकती है। जो साधक साधन-सम्पत्तिकी रक्षा, वृद्धि तथा स्वधर्मपालनके लिये कठिन-से-कठिन कष्टको सहर्ष स्वीकार नहीं करते, जो मन और इन्द्रियोंको भलीभाँति वशमें नहीं कर लेते और जो निष्कामभावसे अनासक्त होकर वर्णाश्रमोचित अवश्यकर्तव्य कर्मका अनुष्ठान नहीं करते, वे ब्रह्मविद्याका यथार्थ रहस्य नहीं जान पाते; क्योंकि ये ही उसे जाननेके प्रधान आधार हैं। साथ ही यह भी जानना चाहिये कि वेद उस ब्रह्मविद्याके समस्त अङ्ग हैं। वेदमें ही ब्रह्मविद्याके समस्त अङ्ग-प्रत्यङ्गोंकी विशद व्याख्या है, अतएव वेदोंका उसके अङ्गोंसहित अध्ययन करना चाहिये और सत्यस्वरूप परमेश्वर अर्थात् त्रिकालाबाधित सच्चिदानन्दघन परमेश्वर ही उस ब्रह्मविद्याका परम अधिष्ठान, आश्रयस्थल और परम लक्ष्य है। अतएव उस ब्रह्मको लक्ष्य करके जो वेदानुसार तप, दम और निष्काम कर्म आदिका आचरण करते हुए उसके तत्त्वका अनुसंधान करते हैं, वे ही ब्रह्मविद्याके सर्वस्व परब्रह्म पुरुषोत्तमको प्राप्त कर सकते हैं॥ ८ ॥

यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति ॥ ९ ॥

यः=कोई भी; एताम् वै=इस प्रसिद्ध ब्रह्मविद्याको; एवम्=पूर्वोक्त प्रकारसे भलीभाँति; वेद=जान लेता है; [सः=वह;] पाप्मानम्=समस्त पाप-समूहको; अपहत्य=नष्ट करके; अनन्ते=अविनाशी असीम; ज्येये=सर्वश्रेष्ठ; स्वर्गे लोके=परमधाममें; प्रतितिष्ठति=प्रतिष्ठित हो जाता है; प्रतितिष्ठति=सदाके लिये स्थित हो जाता है ॥ ९ ॥

व्याख्या—ऊपर बतलाये हुए प्रकारसे जो उपनिषद्-रूपा ब्रह्मविद्याके