ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७४ ईशादि नौ उपनिषद् [ खण्ड ४
रहस्यको जान लेता है, अर्थात् तदनुसार साधनमें प्रवृत्त हो जाता है, वह समस्त पापोंका—परमात्म-साक्षात्कारमें प्रतिबन्धकरूप समस्त शुभाशुभ कर्मोंका अशेषरूपसे नाश करके नित्य-सत्य सर्वश्रेष्ठ परमधाममें स्थित हो जाता है, कभी वहाँसे लौटता नहीं। सदाके लिये वहाँ प्रतिष्ठित हो जाता है। यहाँ 'प्रतिष्ठित' पदका पुनः उच्चारण ग्रन्थ-समाप्तिका सूचक तो है ही, साथ ही उपदेशकी निश्चितताका प्रतिपादक भी है॥ ९॥
चतुर्थ खण्ड समाप्त॥ ४॥
॥ सामवेदीय केनोपनिषद् समाप्त॥
शान्तिपाठ
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोत्, अनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु। तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः
इसका अर्थ इस उपनिषद्के प्रारम्भमें दिया जा चुका है।