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भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 491, कुल 548 में से

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पृष्ठ 491

अध्याय ४ ]

श्वेताश्वतरोपनिषद्

४८९

अजात इत्येवं कश्चिद् भीरुः प्रपद्यते। रुद्र यते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम् ॥ २१ ॥

रुद्र=हे रुद्र (संहार करनेवाले देव) !; अजात=तू अजन्मा है; इति एवम्=यों समझकर; कश्चित्=कोई; भीरुः=जन्म-मरणके भयसे डरा हुआ मनुष्य; प्रपद्यते=तेरी शरण लेता है; (मैं भी वैसा ही हूँ, अतः) ते=तेरा; यत्=जो; दक्षिणम्=दाहिना (कल्याणमय); मुखम्=मुख है; तेन=उसके द्वारा; (तू) नित्यम्=सर्वदा; माम् पाहि=मेरी जन्म-मृत्युरूप भयसे रक्षा कर ॥ २१ ॥

व्याख्या—हे रुद्र! अर्थात् सबका संहार करनेवाले परमेश्वर! आप स्वयं अजन्मा हैं, अतः दूसरोंको भी जन्म-मृत्युसे मुक्त कर देना आपका स्वभाव है। यह समझकर कोई जन्म-मरणके भयसे डरा हुआ साधक इस संसारचक्रसे छुटकारा पानेके लिये आपकी शरण लेता है। मैं भी इस संसारचक्रसे छुटकारा पानेके लिये ही आपकी शरणमें आया हूँ; अतः जो आपका दाहिना मुख है, अर्थात् जो आपका परम शान्त कल्याणमय स्वरूप है, उसके द्वारा आप मेरा इस जन्म-मरणरूप महान् भयसे सदाके लिये रक्षा करें। मुझे सदाके लिये इस भयसे मुक्त कर दें ॥ २१ ॥

मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः। वीरान्मा नो रुद्र भामितो वधीर्हविष्पन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॥ २२ ॥*

रुद्र=हे सबका संहार करनेवाले रुद्रदेव !; [ वयम् ]=हमलोग; हविष्पन्तः=नाना प्रकारकी भेंट लेकर; सदम्=सदा; इत्=ही; त्वा=तुझे; (रक्षाके लिये) हवामहे=बुलाते रहते हैं; (अतः तू) भामितः=कुपित होकर; मा=न तो; नः=हमारे; तोके=पुत्रोंमें; (और) तनये=पौत्रोंमें; मा=न; नः=हमारी; आयुषि=आयुमें; मा=न; नः=हमारी; गोषु=गौओंमें; (और) मा=न; नः=हमारे; अश्वेषु=घोड़ोंमें ही; रीरिषः=किसी

  • यह यजुर्वेद अध्याय १६ का सोलहवाँ मन्त्र है। ऋग्वेद मण्डल १०, सूक्त ११४ का आठवाँ मन्त्र है।