ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 492, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ५ ]
प्रकारकी कमी कर; (तथा) नः=हमारे; वीरान् मा वधीः=वीर पुरुषोंका भी नाश न करें ॥ २२ ॥
व्याख्या —हे सबका संहार करनेवाले रुद्रदेव ! हमलोग नाना प्रकारकी भेंट समर्पण करते हुए सदा ही आपको बुलाते रहते हैं। आप ही हमारी रक्षा करनेमें सर्वथा समर्थ हैं; अतः हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप हमपर कभी कुपित न हों तथा कुपित होकर हमारे पुत्र और पौत्रोंको, हमारी आयुको—जीवनको तथा हमारे गौ, घोड़े आदि पशुओंको कभी किसी प्रकारकी क्षति न पहुँचायें। हमारे जो वीर—साहसी पुरुष हैं, उनका भी नाश न करें; अर्थात् सब प्रकारसे हमारी और हमारे धन-जनकी रक्षा करें ॥ २२ ॥
॥ चतुर्थ अध्याय समाप्त ॥ ४ ॥
पञ्चम अध्याय
द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते विद्याविद्ये निहिते यत्र गूढे। क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्याविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः ॥ १ ॥
यत्र =जिस, ब्रह्मपरे =ब्रह्मासे भी श्रेष्ठ; गूढे =छिपे हुए; अनन्ते =असीम; तु =और; अक्षरे =परम अक्षर परमात्मामें; विद्याविद्ये =विद्या और अविद्या; द्वे =दोनों; निहिते =स्थित हैं (वही ब्रह्म है); क्षरम् =(यहाँ) विनाशशील जडवर्ग; तु =तो; अविद्या =अविद्या नामसे कहा गया है; तु =और; अमृतम् =अविनाशी वर्ग (जीवसमुदाय); हि =ही; विद्या =विद्या नामसे कहा गया है; तु =तथा; यः =जो; विद्याविद्ये ईशते =उपर्युक्त विद्या और अविद्यापर शासन करता है; सः =वह; अन्यः =इन दोनोंसे भिन्न—सर्वथा विलक्षण है ॥ १ ॥
व्याख्या —जो परमेश्वर ब्रह्मासे भी अत्यन्त श्रेष्ठ हैं, अपनी मायाके पर्देमें छिपे हुए हैं, सीमारहित और अविनाशी हैं अर्थात् जो देश-कालसे सर्वथा अतीत हैं तथा जिनका कभी किसी प्रकारसे भी विनाश नहीं हो सकता तथा जिन