ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 499, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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अपर (अर्थात् परमात्मासे भिन्न जीवात्मा); अपि=भी; हि=निःसंदेह; दृष्टः= (ज्ञानियोंद्वारा) देखा गया है ॥ ८ ॥
व्याख्या —मनुष्यका हृदय अँगूठेके नापका माना गया है और हृदयमें ही जीवात्माका निवास है। इसलिये उसे अङ्गुष्ठमात्र—अँगूठेके नापका कहा जाता है। उसका वास्तविक स्वरूप सूर्यकी भाँति प्रकाशमय (विज्ञानमय) है। उसे अज्ञानरूपी अन्धकार छूतक नहीं गया है। वह संकल्प और अहंकार—इन दोनोंसे युक्त हो रहा है, अतः संकल्परूप बुद्धिके गुणसे अर्थात् अन्तःकरण और इन्द्रियोंके धर्मोंसे तथा अहंकाररूप अपने गुणसे अर्थात् अहंता-ममता आदिसे सम्बद्ध होनेके कारण सृजकी नोकके समान सूक्ष्म आकारवाला है और परमात्मासे भिन्न है। जीवके तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानी पुरुषोंने गुणोंसे युक्त हुए जीवात्माका स्वरूप ऐसा ही देखा है।* तात्पर्य यह कि आत्माका स्वरूप वास्तवमें अत्यन्त सूक्ष्म है; सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म जड़ पदार्थ उसकी तुलनामें स्थूल ही ठहरता है। उसकी सूक्ष्मता किसी भी जड़ पदार्थके परिमाणसे नहीं मापी जा सकती। केवल उसका लक्ष्य करानेके लिये उसे सम्बद्ध वस्तुके आकारका बताया जाता है। हृदय-देशमें स्थित होनेके कारण उसे अङ्गुष्ठपरिमाण कहा जाता है और बुद्धिगुण तथा आत्मगुणके सम्बन्धसे उसे सृजकी नोकके आकारका बताया जाता है। बुद्धि आदिको सूर्यकी नोकके समान कहा गया है, इसीसे जीवात्माको यहाँ सृजकी नोकके सदृश बताया गया है ॥ ८ ॥
सम्बन्ध —पूर्वमन्त्रमें जो जीवात्माका स्वरूप सृजकी नोकके सदृश सूक्ष्म बताया गया है, उसे पुनः स्पष्ट करते हैं—
वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च। भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ ९ ॥
- गीतामें भी कहा है कि एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेवाले, शरीरमें स्थित रहनेवाले अथवा विषयोंको भोगनेवाले इस गुणान्वित जीवात्माको मूर्ख नहीं जानते, ज्ञानरूप नेत्रोंवाले ज्ञानी जानते हैं (१५।१०)।