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भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 498, कुल 548 में से

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय ५ ]

ही है (गीता १३।२१); जो गुणातीत हो गया है, वह नहीं घूमता। मन्त्रका सारांश यह है कि जो जीवात्मा सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे बँधा हुआ है (गीता १४।५), वह नाना प्रकारके कर्मफलरूप भोगोंकी प्राप्तिके उद्देश्यसे नाना प्रकारके कर्म करता है और अपने किये हुए उन कर्मोंका फल भोगनेके लिये नाना योनियोंमें जन्म लेकर विभिन्न रूपोंमें प्रकट होता है और जहाँ भी जाता है, तीनों गुणोंसे युक्त रहता है। मृत्युके अनन्तर उसकी कर्मानुसार तीन गतियाँ होती हैं अर्थात् शरीर छोड़नेपर वह तीन मार्गोंसे जाता है। वे तीन मार्ग हैं—देवयान, पितृयान और तीसरा निरन्तर जन्म-मृत्युके चक्रमें घूमना।* वह प्राणोंका अधिपति जीवात्मा जबतक मुक्त नहीं हो जाता, तबतक अपने किये हुए कर्मोंसे प्रेरित होकर नाना लोकोंमें भिन्न-भिन्न प्रकारकी योनियोंको ग्रहण करके इस संसारचक्रमें घूमता रहता है ॥७॥

सम्बन्ध—जीवात्माका स्वरूप कैसा है, इस जिज्ञासापर कहते हैं—

अङ्गुष्ठमात्रो

रवितुल्यरूपः

संकल्पाहङ्कारसमन्वितो

यः।

बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन

चैव

आराग्रमात्रो

ह्यपरोऽपि

दृष्टः ॥८॥

यः=जो; अङ्गुष्ठमात्रः=अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला; रवितुल्यरूपः=सूर्यके समान प्रकाशस्वरूप; (तथा) संकल्पाहङ्कारसमन्वितः=संकल्प और अहङ्कारसे युक्त है; बुद्धेः=बुद्धिके; गुणेन=गुणके कारण; च=और; आत्मगुणेन=अपने गुणके कारण; एव=ही; आराग्रमात्रः=सूजेकी नोकके जैसे सूक्ष्म आकारवाला है; अपरः=ऐसा

  • छान्दोग्य-उपनिषद्में ५।१०।२ से ८ तक और बृहदारण्यक० ६।२।१५-१६ में इन तीन मार्गोंका वर्णन आया है। देवयान-मार्गसे जानेवाले ब्रह्मलोकतक जाकर वहाँसे लौटते नहीं, ब्रह्माके साथ ही मुक्त हो जाते हैं; पितृयानसे जानेवाले स्वर्गमें जाकर चिरकालतक वहाँके दिव्य सुखोंका उपभोग करते हैं और पुण्य क्षीण हो जानेपर पुनः मृत्युलोकमें ढकेल दिये जाते हैं; और तीसरे मार्गसे जानेवाले कीट-पतङ्गादि शुद्ध योनियोंमें भटकते रहते हैं।