ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 497, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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व्याख्या —वे परब्रह्म परमात्मा वेदोंकी रहस्यविद्यारूप उपनिषदोंमें छिपे हुए हैं अर्थात् उनके स्वरूपका वर्णन उपनिषदोंमें गुस्रूपसे किया गया है। वेद निकले भी उन्हींसे हैं—उन्हींके निःश्वासरूप हैं—‘यस्य निःश्वसितं वेदाः ’। इस प्रकार वेदोंमें छिपे हुए और वेदोंके प्राकट्य-स्थान उन परमात्माको ब्रह्माजी जानते हैं। उनके सिवा और भी जिन पूर्ववर्ती देवताओं और ऋषियोंने उनको जाना था, वे सब-के-सब उन्हींमें तन्मय होकर आनन्दस्वरूप हो गये। अतः मनुष्यको चाहिये कि उन सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सबके अधीश्वर परमात्माको उक्त प्रकारसे मानकर उन्हें जानने और पानेके लिये तत्पर हो जाय ॥ ६ ॥
सम्बन्ध — पाँचवें मन्त्रमें यह बात कही गयी थी कि परमेश्वर सब जीवोंका उनके कर्मानुसार गुणोंके साथ संयोग कराते हैं; अतः जीवात्माका स्वरूप और नाना योनियोंमें विचरनेका कारण आदि बतानेके लिये अलग प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
गुणान्वयो यः फलकर्मकर्ता कृतस्य तस्यैव स चोपभोक्ता। स विश्वरूपस्त्रिगुणस्त्रिवर्त्ता प्राणाधिपः संचरति स्वकर्मभिः ॥ ७ ॥
यः गुणान्वयः =जो गुणोंसे बँधा हुआ है; सः =वह; फलकर्मकर्ता =फलके उद्देश्यसे कर्म करनेवाला जीवात्मा; एव =ही; तस्य =उस; कृतस्य =अपने किये हुए कर्मके फलका; उपभोक्ता =उपभोग करनेवाला; विश्वरूपः =विभिन्न रूपोंमें प्रकट होनेवाला; त्रिगुणः =तीन गुणोंसे युक्त; च =और त्रिवर्त्ता =कर्मानुसार तीन मार्गोंसे गमन करनेवाला है; सः =वह; प्राणाधिपः =प्राणोंका अधिपति (जीवात्मा); स्वकर्मभिः =अपने कर्मोंसे प्रेरित होकर; संचरति =नाना योनियोंमें विचरता है ॥ ७ ॥
व्याख्या —इस मन्त्रमें प्रकरण आरम्भ करते ही जीवात्माके लिये ‘गुणान्वयः ’ विशेषण देकर यह भाव दिखाया गया है कि जो जीव गुणोंसे सम्बद्ध अर्थात् प्रकृतिमें स्थित है, वही इस जन्म-मरणरूप संसारचक्रमें घूमता