ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 496, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ५ ]
तत्त्वोंकी शक्तिरूप स्वभावको; पचति=(अपने संकल्परूप तपसे) पकाता है; च=तथा; य=:जो; सर्वान्=समस्त; पाच्यान्=पकाये जानेवाले पदार्थोंको; परिणामयेत्=नाना रूपोंमें परिवर्तित करता है; (और) य=:जो; एकः=अकेला ही; सर्वान्=समस्त; गुणान् विनियोजयेत्=गुणोंका जीवोंके साथ यथायोग्य संयोग कराता है; च=तथा; एतत्=इस; सर्वम्=समस्त; विश्वम् अधितिष्ठति=विश्वका शासन करता है (वह परमात्मा है) ॥ ५ ॥
व्याख्या —जो इस सम्पूर्ण विश्वके परम कारण हैं, अर्थात् जिनका और कोई कारण नहीं है, जगत्के कारणरूपसे कहे जानेवाले समस्त तत्त्वोंकी शक्तिरूप स्वभावको जो अपने संकल्परूप तपसे पकाते हैं—अर्थात् उन आकाशादि तत्त्वोंकी जो भिन्न-भिन्न शक्तियाँ प्रलयकालमें लुप्त हो गयी थीं, उन्हें अपने संकल्पद्वारा पुनः प्रकट करते हैं और उन प्रकट की हुई शक्तियोंका नाना रूपोंमें परिवर्तन कर इस विचित्र जगत्की रचना करते हैं तथा सत्त्व आदि तीनों गुणोंका तथा उनसे उत्पन्न हुए पदार्थोंका जीवोंके साथ उनके कर्मानुसार यथायोग्य सम्बन्ध स्थापित करते हैं—इस प्रकार जो अकेले ही इस सम्पूर्ण जगत्की सारी व्यवस्था करके इसपर शासन करते हैं, वे ही पूर्वमन्त्रमें कहे हुए सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वर हैं ॥ ५ ॥
तद् वेदगुह्योपनिषत्सु गृहं तद् ब्रह्मा वेदते ब्रह्मयोनिम् । ये पूर्वदेवा ऋषयश्च तद्विदु- स्ते तन्मया अमृता वै बभूवुः ॥ ६ ॥
तत्=वह; वेदगुह्योपनिषत्सु=वेदोंके रहस्यभूत उपनिषदोंमें; गृहम्=छिपा हुआ है; ब्रह्मयोनिम्=वेदोंके प्राकट्य-स्थान; तत्=उस परमात्माको; ब्रह्मा=ब्रह्मा; वेदते=जानता है; ये=जो; पूर्वदेवाः=पुरातन देवता; च=और; ऋषयः=ऋषिलोग; तत्=उसको; विदुः=जानते थे; ते=वे; वै=अवश्य ही; तन्मयाः=(उसमें) तन्मय होकर; अमृताः=अमृतरूप; बभूवुः=हो गये ॥ ६ ॥