ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 495, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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लीला अतर्क्य है, तर्कसे उसका रहस्य समझमें नहीं आ सकता। उनके सेवक ही उनकी लीलाके रहस्यको कुछ समझते हैं ॥ ३ ॥
सर्वां दिश ऊर्ध्वमधश्च तिर्यक् प्रकाशयन् भ्राजते यद्वनड्वान् । एवं स देवो भगवान् वरेण्यो योनिस्वभावानधितिष्ठत्येकः ॥ ४ ॥
यत् उ=जिस प्रकार; अनड्वान्=सूर्य; (अकेला ही) सर्वाः=समस्त; दिशः=दिशाओंको; ऊर्ध्वम् अधः=ऊपर-नीचे; च=और; तिर्यक्=इधर-उधर—सब ओरसे; प्रकाशयन्=प्रकाशित करता हुआ; भ्राजते=देदीप्यमान होता है; एवम्=उसी प्रकार; सः=वह; भगवान्=भगवान्; वरेण्यः देवः=स्वामी बननेके योग्य (सर्वश्रेष्ठ) परमदेव परमेश्वर; एकः=अकेला ही; योनिस्वभावान् अधितिष्ठति=समस्त कारणरूप अपनी शक्तियोंपर आधिपत्य करता है ॥ ४ ॥
व्याख्या—जिस प्रकार यह सूर्य समस्त दिशाओंको ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर—सब ओरसे प्रकाशित करता हुआ देदीप्यमान होता है, उसी प्रकार वे भगवान्—सर्वविध ऐश्वर्यसे सम्पन्न, सबके द्वारा भजनेयोग्य परमदेव परमेश्वर अकेले ही समस्त कारणरूप अपनी भिन्न-भिन्न शक्तियोंके अधिष्ठाता होकर उन सबका संचालन करते हैं, सबको अपना-अपना कार्य करनेकी सामर्थ्य देकर यथायोग्य कार्यमें प्रवृत्त करते हैं ॥ ४ ॥
सम्बन्ध—ऊपर कही हुई बातका इस मन्त्रमें स्पष्टीकरण किया जाता है—
यच्च स्वभावं पचति विश्वयोनिः पाच्यांश्च सर्वान् परिणामयेद् यः । सर्वमेतद् विश्वमधितिष्ठत्येको गुणांश्च सर्वान् विनियोजयेद् यः ॥ ५ ॥
यत्=जो; विश्वयोनिः=सबका परम कारण है; च=और; स्वभावम्=समस्त