ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 494, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ५ ]
एकमात्र अधिपति हैं, अर्थात् वे सब-के-सब जिनके अधीन हैं, जो सबसे पहले उत्पन्न हुए कपिल ऋषिको* अर्थात् हिरण्यगर्भ ब्रह्माको प्रत्येक सर्गके आदिमें सब प्रकारके ज्ञानोंसे पुष्ट करते हैं—सब प्रकारके ज्ञानोंसे सम्पन्न करके उन्नत करते हैं तथा जिन्होंने सबसे पहले उत्पन्न होते हुए उन हिरण्यगर्भको देखा था, वे ही सर्वशक्तिमान् सर्वाधार सबके स्वामी परब्रह्म पुरुषोत्तम हैं ॥ २ ॥
एकैकं जालं बहुधा विकूर्व- त्रस्मिन् क्षेत्रे संहरत्येष देवः । भूयः सूष्टा पतयस्तथेशः सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा ॥ ३ ॥
एषः=यह; देवः=परमदेव (परमेश्वर); अस्मिन् क्षेत्रे=इस जगत्-क्षेत्रमें; (सृष्टिके समय) एकैकम्=एक-एक; जालम्=जालको (बुद्धि आदि और आकाशादि तत्त्वोंको); बहुधा=बहुत प्रकारसे; विकूर्वन्=विभक्त करके; (उसका) संहरति=(प्रलयकालमें) संहार कर देता है; महात्मा=(वह) महामना; ईशः=ईश्वर; भूयः=पुनः (सृष्टिकालमें); तथा=पहलेकी भाँति; पतयः सूष्टा=समस्त लोकपालोंकी रचना करके; सर्वाधिपत्यम् कुरुते=(स्वयं) सबपर आधिपत्य करता है ॥ ३ ॥
व्याख्या—जिनका प्रकरण चल रहा है, वे परमदेव परमेश्वर इस जगत्-रूप क्षेत्रमें सृष्टिके समय एक-एक जालको अर्थात् बुद्धि आदि और आकाश आदि अपनी प्रकृतियोंको बहुत प्रकारसे विभक्त करके—प्रत्येक प्रकृतिको भिन्न-भिन्न रूप, नाम और शक्तियोंसे युक्त करके उनका विस्तार करते हैं और स्वयं ही प्रलयकालमें उन सबका संहार कर लेते हैं। वे महामना परमेश्वर पुनः सृष्टिकालमें पहलेकी भाँति ही समस्त लोकोंकी और उनके अधिपतियोंकी रचना करके स्वयं उन सबके अधिष्ठाता बनकर उन सबपर शासन करते हैं। उनकी
- कुछ विद्वानोंने 'कपिल' शब्दको सांख्यशास्त्रके आदि वक्ता एवं प्रवर्तक भगवान् कपिलमुनिका वाचक माना है और इस प्रकार उनके द्वारा उपदिष्ट मतकी प्राचीनता एवं प्रामाणिकता सिद्ध की है।