ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 501, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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जिस-जिस; शरीरम्-शरीरको; आदत्ते=ग्रहण करता है; तेन तेन=उस-उससे; युज्यते=सम्बद्ध हो जाता है ॥ १० ॥
व्याख्या —जीवात्मा वास्तवमें न तो स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है। यह जब जिस शरीरको ग्रहण करता है, उस समय उससे संयुक्त होकर वैसा ही बन जाता है। जो जीवात्मा आज स्त्री है, वही दूसरे जन्ममें पुरुष हो सकता है; जो पुरुष है, वह स्त्री हो सकता है। भाव यह कि ये स्त्री, पुरुष और नपुंसक आदि भेद शरीरको लेकर हैं; जीवात्मा सर्वभेदशून्य है, सारी उपाधियोंसे रहित है ॥ १० ॥
संकल्पनस्पर्शनदृष्टिभोहै-
ग्रीसाम्बुवृष्ट्या
चात्मविवृद्धिजन्म ।
कर्मानुगान्यनुक्रमेण
देही
स्थानेषु
रूपाण्यभिस्सम्प्रपद्यते ॥ ११ ॥
संकल्पनस्पर्शनदृष्टिभोहै =संकल्प, स्पर्श, दृष्टि और मोहसे; च =तथा; ग्रीसाम्बुवृष्ट्या =भोजन, जलपान और वर्षाके द्वारा; चात्मविवृद्धिजन्म = (प्राणियोंके) सजीव शरीरकी वृद्धि और जन्म होते हैं; देही =यह जीवात्मा; स्थानेषु =भिन्न-भिन्न लोकोंमें; कर्मानुगानि =कर्मानुसार मिलनेवाले; रूपाणि =भिन्न-भिन्न शरीरोंको; अनुक्रमेण =अनुक्रमसे; अभिस्सम्प्रपद्यते =बार-बार प्राप्त होता रहता है ॥ ११ ॥
व्याख्या —संकल्प, स्पर्श, दृष्टि, मोह, भोजन, जलपान और वृष्टि— इन सबसे सजीव शरीरकी वृद्धि और जन्म होते हैं। इसका एक भाव तो यह है कि स्त्री-पुरुषके परस्पर मोहपूर्वक संकल्प, स्पर्श और दृष्टिपातके द्वारा सहवास होनेपर जीवात्मा गर्भमें आता है; फिर माताके भोजन और जलपानसे बने हुए उसके द्वारा उसकी वृद्धि होकर जन्म होता है। दूसरा भाव यह है कि भिन्न-भिन्न योनियोंमें जीवोंकी उत्पत्ति और वृद्धि भिन्न-भिन्न प्रकारसे होती है। किसी योनिमें तो संकल्पमात्रसे ही जीवोंका पोषण होता रहता है, जैसे कछुएके अंडोंका; किसी योनिमें आसक्तिपूर्वक स्पर्शसे होता है, जैसे पक्षियोंके अंडोंका;