ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 502, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ५ ]
किसी योनिमें केवल आसक्तिपूर्वक दर्शनमात्रसे ही होता है, जैसे मछली आदिका; किसी योनिमें अन्नभक्षणसे और जलपानसे होता है, जैसे मनुष्य-पशु आदिका और किसी योनिमें वृष्टिमात्रसे ही हो जाता है, जैसे वृक्ष-लता आदिका। इस प्रकार नाना प्रकारसे सजीव शरीरोंका पालन-पोषण, तुष्टि-पुष्टिरूप वृद्धि और जन्म होते हैं। जीवात्मा अपने कर्मोंके अनुसार उनका फल भोगनेके लिये इसी प्रकार विभिन्न लोकोंमें गमन करता हुआ एकके बाद एकके क्रमसे नाना शरीरोंको बार-बार धारण करता रहता है ॥ ११ ॥
सम्बन्ध— इसका बार-बार नाना योनियोंमें आवागमन क्यों होता है, इस जिज्ञासापर कहते हैं—
स्थूलानि सूक्ष्माणि बहूनि चैव रूपाणि देही स्वगुणैर्वृणोति । क्रियागुणैरात्मगुणैश्च तेषां संयोगहेतुरपरोऽपि दृष्टः ॥ १२ ॥
देही=जीवात्मा; क्रियागुणैः=अपने कर्मोंके (संस्काररूप) गुणोंसे; च=तथा; आत्मगुणैः=शरीरके गुणोंसे (युक्त होनेके कारण); स्वगुणैः=अहंता, ममता आदि अपने गुणोंके वशीभूत होकर; स्थूलानि=स्थूल; च=और; सूक्ष्माणि=सूक्ष्म; बहूनि एव=बहुत-से; रूपाणि=रूपों (आकृतियों, शरीरों)को; वृणोति=स्वीकार करता है; तेषाम्=उनके; संयोगहेतुः=संयोगका कारण; अपरः=दूसरा; अपि=भी; दृष्टः=देखा गया है ॥ १२ ॥
व्याख्या— जीवात्मा अपने किये हुए कर्मोंके संस्कारोंसे और बुद्धि, मन, इन्द्रिय तथा पञ्चभूत—इनके समुदायरूप शरीरके धर्मोंसे युक्त होनेके कारण अहंता-ममता आदि अपने गुणोंके वशीभूत होकर अनेकानेक शरीर धारण करता है। अर्थात् शरीरके धर्मोंमें अहंता-ममता करके तद्रूप हो जानेके कारण नाना प्रकारके स्थूल और सूक्ष्म रूपोंको स्वीकार करता है—अपने कर्मानुसार भिन्न-भिन्न योनियोंमें जन्म लेता है। परंतु इस प्रकार जन्म लेनेमें यह स्वतन्त्र नहीं है,