ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 503, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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इससे संकल्प और कर्मिक अनुसार उन-उन योनियोंसे इसका सम्बन्ध जोड़नेवाला कोई दूसरा ही है। वे हैं पूर्वोक्त परमेश्वर, जिन्हें तत्त्वज्ञानी महापुरुषोंने देखा है। वे इस रहस्यको भलीभाँति जानते हैं। यहाँ कर्मिक संस्कारोंका नाम क्रिया-गुण है, समस्त तत्त्वोंके समुदायरूप शरीरको देखना, सुनना, समझना आदि शक्तियोंका नाम आत्मगुण है और इनके सम्बन्धसे जीवात्मामें जो अहंता, ममता, आसक्ति आदि आ जाते हैं, उनका नाम स्वगुण है॥ १२॥
सम्बन्ध— अनादिकालसे चले आते हुए इस जन्म-मरणरूप बन्धनसे छूटनेका क्या उपाय है, इस जिज्ञासापर कहा जाता है—
अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम्। विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः॥ १३॥
कलिलस्य=कलिल (दुर्गम संसार) के; मध्ये=भीतर व्यास; अनाद्यनन्तम्=आदि-अन्तसे रहित; विश्वस्य स्रष्टारम्=समस्त जगत्की रचना करनेवाले; अनेकरूपम्=अनेकरूपधारी; (तथा) विश्वस्य परिवेष्टितारम्=समस्त जगत्को सब ओरसे घेरे हुए; एकम्=एक (अद्वितीय); देवम्=परमदेव परमेश्वरको; ज्ञात्वा=जानकर; (मनुष्य) सर्वपाशैः=समस्त बन्धनोंसे; मुच्यते=सर्वथा मुक्त हो जाता है॥ १३॥
व्याख्या— पूर्वमन्त्रमें जिनको इस जीवात्माका नाना योनियोंके साथ सम्बन्ध जोड़नेवाला बताया गया है, जो अन्तर्धामीरूपसे मनुष्यके हृदयरूप गुहामें स्थित तथा निराकाररूपसे इस समस्त जगत्में व्याप्त हैं, जिनका न तो आदि है और न अन्त ही है, अर्थात् जो उत्पत्ति, विनाश और वृद्धि-क्षय आदि सब प्रकारके विकारोंसे सर्वथा शून्य—सदा एकरस रहनेवाले हैं, तथापि जो समस्त जगत्की रचना करके विविध रूपोंमें प्रकट होते हैं और जिन्होंने इस समस्त जगत्को सब ओरसे घेर रखा है, उन एकमात्र सर्वाधार,