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भारतकोश
ईशादि नौ उपनिषद्

ईशादि नौ उपनिषद्

Ishadi Nau Upanishad

ऋषिगण द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 504, कुल 548 में से

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ईशादि नौ उपनिषद्

[ अध्याय ५ ]

सर्वशक्तिमान्, सबका शासन करनेवाले, सर्वेश्वर परब्रह्म पुरुषोत्तमको जानकर यह जीवात्मा सदाके लिये समस्त बन्धनोंसे सर्वथा छूट जाता है॥१३॥

सम्बन्ध— अब अध्यायके उपसंहारमें ऊपर कही हुई बातको पुनः स्पष्ट करते हुए परमात्माकी प्रापिका उपाय बताया जाता है—

भावग्राह्यमनीडाख्यं भावाभावकरं शिवम्। कलासर्गकरं देवं ये विदुस्ते जहुस्तनुम्॥१४॥

भावग्राह्यम्=श्रद्धा और भक्तिके भावसे प्राप्त होने योग्य; अनीडाख्यम्=आश्रयरहित कहे जानेवाले; (तथा) भावाभावकरम्=जगत्की उत्पत्ति और संहार करनेवाले; शिवम्=कल्याणस्वरूप; (तथा) कलासर्गकरम्=सोलह कलाओंकी रचना करनेवाले; देवम्=परमदेव परमेश्वरको; ये=जो साधक; विदुः=जान लेते हैं; ते=वे; तनुम्=शरीरको; (सदाके लिये) जहुः=त्याग देते हैं—जन्म-मृत्युके चक्करसे छूट जाते हैं॥१४॥

व्याख्या— वे परब्रह्म परमेश्वर आश्रयरहित अर्थात् शरीररहित हैं; यह प्रसिद्ध है; तथा वे जगत्की उत्पत्ति और संहार करनेवाले तथा (प्रश्नोपनिषद् ६।६।४ में बताया हुई) सोलह कलाओंको भी उत्पन्न करनेवाले हैं। ऐसा होनेपर भी वे कल्याणस्वरूप आनन्दमय परमेश्वर श्रद्धा, भक्ति और प्रेमभावसे पकड़े जा सकते हैं; जो मनुष्य उन परमदेव परमेश्वरको जान लेते हैं, वे शरीरसे अपना सम्बन्ध सदाके लिये छोड़ देते हैं अर्थात् इस संसार-चक्रसे सदाके लिये छूट जाते हैं।

इस रहस्यको समझकर मनुष्यको जितना शीघ्र हो सके, उन परम सुहृद, परम दयालु, परम प्रेमी, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सर्वेश्वर परमात्माको जानने और पानेके लिये व्याकुल हो श्रद्धा और भक्तिभावसे उनकी आराधनामें लग जाना चाहिये॥१४॥

॥ पञ्चम अध्याय समाप्त॥५॥

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