ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 505, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
५०३
षष्ठ अध्याय
स्वभावमेके | कवयो | वदन्ति | ---|---|---|--- | कालं | तथान्ये | परिमुह्यमानाः । देवस्यैष | महिमा | तु | लोके | येनेदं | भ्राम्यते | ब्रह्मचक्रम् ॥ १ ॥
एके=कितने ही; कवयः=बुद्धिमान् लोग; स्वभावम्=स्वभावको; वदन्ति=जगत्का कारण बताते हैं; तथा=उसी प्रकार; अन्ये=कुछ दूसरे लोग; कालम्=कालको जगत्का कारण बतलाते हैं; [ एते ] परिमुह्यमानाः [ सन्ति ]=(वास्तवमें) ये लोग मोहग्रस्त हैं (अतः वास्तविक कारणको नहीं जानते); तु=वास्तवमें तो; एषः=यह; देवस्य=परमदेव परमेश्वरकी; लोके=समस्त जगत्में फैली हुई; महिमा=महिमा है; येन=जिसके द्वारा; इदम्=यह; ब्रह्मचक्रम्=ब्रह्मचक्र; भ्राम्यते=घुमाया जाता है ॥ १ ॥
व्याख्या —कितने ही बुद्धिमान् लोग तो कहते हैं कि इस जगत्का कारण स्वभाव है। अर्थात् पदार्थोंमें जो स्वाभाविक शक्ति हैं—जैसे अग्निमें प्रकाशन-शक्ति और दाह-शक्ति वही इस जगत्का कारण है। कुछ दूसरे लोग कहते हैं कि काल ही जगत्का कारण है; क्योंकि समयपर ही वस्तुगत शक्तिका प्राकट्य होता है, जैसे वृक्षमें फल आदि उत्पन्न करनेकी शक्ति समयपर ही प्रकट होती है। इसी प्रकार स्त्रियोंमें गर्भाधान ऋतुकालमें ही होता है, असमयमें नहीं होता—यह प्रत्यक्ष देखा जाता है। परंतु अपनेको पण्डित समझनेवाले ये वैज्ञानिक मोहमें पड़े हुए हैं, अतः ये इस जगत्के वास्तविक कारणको नहीं जानते। वास्तवमें तो यह परमदेव सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी ही महिमा है, जगत्की विचित्र रचनाको देखने और उसपर विचार करनेपर उन्हींका महत्त्व प्रकट होता है। वे स्वभाव और काल आदि समस्त कारणोंके अधिपति हैं और उन्हींके द्वारा यह संसार-चक्र घुमाया जाता है। इस रहस्यको समझकर इस चक्रसे छुटकारा पानेके लिये उन्हींकी शरण लेनी चाहिये। संसार-चक्रकी व्याख्या १।४ में की गयी है ॥ १ ॥