ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 510, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ६ ]
आत्मस्थम्—अपने हृदयमें स्थित; ज्ञात्वा=जानकर; (साधक) अमृतम् [ एति ]=अमृतस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥
व्याख्या —जिनकी अचिन्त्यशक्तिके प्रभावसे यह प्रपञ्चरूप संसार निरन्तर घूम रहा है—प्रवाहरूपसे सदा चलता रहता है, वे परमात्मा इस संसारवृक्ष, काल और आकृति आदिसे सर्वथा अतीत और भिन्न हैं अर्थात् वे संसारसे सर्वथा सम्बन्धरहित, कालका भी ग्रास कर जानेवाले एवं आकाररहित हैं; तथापि वे धर्मकी वृद्धि एवं पापका नाश करनेवाले, समस्त ऐश्वर्यके अधिपति और समस्त जगत्के आधार हैं। यह सम्पूर्ण विश्व उन्हींके आश्रित है, उन्हींकी सत्तासे टिका हुआ है। अन्तर्मीरूपसे वे हमारे हृदयमें भी हैं। इस प्रकार उन्हें जानकर ज्ञानयोगी उन अमृतस्वरूप परमात्माको प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥
सम्बन्ध —पहले अध्यायमें जिनका वर्णन आया है, वे ध्यानके द्वारा परमात्माका प्रत्यक्ष करनेवाले महात्मा कहते हैं—
| तमीश्वराणां | परमं | महेश्वरं |
|---|---|---|
| तं | देवतानां | परमं च दैवतम्। |
| पतिं | पतीनां | परमं परस्ताद् |
| विदाम | देवं भुवनेशमीड्यम् ॥ ७ ॥ |
तम्=उस; ईश्वराणाम्=ईश्वरोंके भी; परमम्=परम; महेश्वरम्=महेश्वर; देवतानाम्=सम्पूर्ण देवताओंके; च=भी; परमम्=परम; दैवतम्=देवता; पतीनाम्=पतियोंके भी; परमम्=परम; पतिम्=पति; (तथा) भुवनेशम्=समस्त ब्रह्माण्डके स्वामी; (एवं) ईड्यम्=स्तुति करनेयोग्य; तम्=उस; देवम्=प्रकाशस्वरूप परमात्माको; (हमलोग) परस्तात्=सबसे परे; विदाम=जानते हैं ॥ ७ ॥
व्याख्या —वे परब्रह्म पुरुषोत्तम समस्त ईश्वरोंके—लोकपालोंके भी महान् शासक हैं, अर्थात् वे सब भी उन महेश्वरके अधीन रहकर जगत्का शासन करते हैं। समस्त देवताओंके भी वे परम आराध्य हैं, समस्त पतियों—रक्षकोंके भी परम पति हैं तथा समस्त ब्रह्माण्डोंके स्वामी हैं। उन स्तुति करनेयोग्य