ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 509, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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हेतुः=प्रकृतिके साथ जीवका संयोग करानेमें कारणोंका भी कारण; दृष्टः=देखा गया है; स्वचित्तस्थम्=अपने अन्तःकरणमें स्थित; तम्=उस; विश्वरूपम्=सर्वरूप; (एवं) भवभूतम्=जगत्-रूपमें प्रकट; ईड्यम्=स्तुति करनेयोग्य; पूर्वम्=पुराणपुरुष; देवम् उपास्य=परम देव (परमेश्वर) की उपासना करके (उसे प्राप्त करना चाहिये) ॥५॥
व्याख्या —वे समस्त जगत्के आदि कारण सर्वशक्तिमान् परमेश्वर तीनों कालोंसे सर्वथा अतीत हैं। उनमें कालका कोई भेद नहीं है, भूत और भविष्य भी उनकी दृष्टिमें वर्तमान ही हैं। वे (प्रश्नोपनिषद्में बतायी हुई) सोलह कलाओंसे रहित होनेपर भी अर्थात् संसारसे सर्वथा सम्बन्धरहित होते हुए भी प्रकृतिके साथ जीवका संयोग करानेवाले कारणके भी कारण हैं। यह बात इस रहस्यको जाननेवाले ज्ञानी महापुरुषोंद्वारा देखी गयी है। वे परमेश्वर ही एकमात्र स्तुति करनेयोग्य हैं। उन्हें दृढ़नेके लिये कहीं दूर जानेकी आवश्यकता नहीं है। वे हमारे हृदयमें ही स्थित हैं। इस बातपर दृढ़ विश्वास करके सब प्रकारके रूप धारण करनेवाले तथा जगत्-रूपमें प्रकट हुए, सर्वाधार, सर्वशक्तिमान्, परम देव पुराणपुरुष परमेश्वरकी उपासना करके उन्हें प्राप्त करना चाहिये ॥५॥
सम्बन्ध —अब ज्ञानयोगरूप तीसरा साधन बताया जाता है—
| स | वृक्षकालाकृतिभिः | परोऽन्यो |
|---|---|---|
| यस्मात् प्रपञ्चः | परिवर्ततेऽयम्। | |
| धर्मावहं | पापनुदं | भगेशं |
| ज्ञात्वात्मस्थममृतं | विश्वधाम ॥ ६ ॥ |
यस्मात्=जिससे; अयम्=यह; प्रपञ्चः=प्रपञ्च (संसार); परिवर्तते=निरन्तर चलता रहता है; सः=वह (परमात्मा); वृक्षकालाकृतिभिः=इस संसारवृक्ष, काल और आकृति आदिसे; परः=सर्वथा अतीत; (एवं) अन्यः=भिन्न है; (उस) धर्मावहम्=धर्मकी वृद्धि करनेवाले; पापनुदम्=पापका नाश करनेवाले; भगेशम्=सम्पूर्ण ऐश्वर्यके अधिपति; (तथा) विश्वधाम=समस्त जगत्के आधारभूत परमात्माको;