ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 508, कुल 548 में से
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ईशादि नौ उपनिषद्
[ अध्याय ६ ]
यः=जो साधक; गुणान्वितानि=सत्त्वादि गुणोंसे व्यास; कर्माणि=कर्मोंको; आरभ्य=आरम्भ करके; (उनको) च=तथा; सर्वात्=समस्त; भावान्=भावोंको; विनियोजयेत्=परमात्मामें लगा देता है—उसके समर्पण कर देता है; (उसके इस समर्पणसे) तेषाम्=उन कर्मोंका; अभावे=अभाव हो जानेपर; (उस साधकके) कृतकर्मानाशः=पूर्वसंचित कर्म-समुदायका भी सर्वथा नाश हो जाता है; कर्मक्षये=(इस प्रकार) कर्मोंका नाश हो जानेपर; सः=वह साधक; याति=परमात्माको प्राप्त हो जाता है; (क्योंकि वह जीवात्मा) तत्त्वतः=वास्तवमें; अन्यः=समस्त जड़-समुदायसे भिन्न (चेतन) है ॥ ४ ॥
व्याख्या—जो कर्मयोगी सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे व्यास अपने वर्ण, आश्रम और परिस्थितिके अनुकूल कर्तव्यकर्मोंका आरम्भ करके उनको और अपने सब प्रकारके अहंता, ममता, आसक्ति आदि भावोंको उन परब्रह्म परमेश्वरमें लगा देता है, उनके समर्पण कर देता है, उस समर्पणसे उन कर्मोंके साथ साधकका सम्बन्ध न रहनेके कारण वे उसे फल नहीं देते। इस प्रकार उनका अभाव हो जानेसे पहले किये हुए संचित कर्म-संस्कारोंका भी सर्वथा नाश हो जाता है। इस प्रकार कर्मोंका नाश हो जानेसे वह तुरंत परमात्माको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि यह जीवात्मा वास्तवमें जड़ तत्त्वसमुदायसे सर्वथा भिन्न एवं अत्यन्त विलक्षण है। उनके साथ इसका सम्बन्ध अहंता-ममता आदिके कारण ही है, स्वाभाविक नहीं है ॥ ४ ॥
सम्बन्ध—कर्मयोगका वर्णन करके अब उपासनारूप दूसरा साधन बताया जाता है—
आदिः | स | संयोगनिमित्तहेतुः | ---|---|---|--- | परस्त्रिकालादकलौऽपि | | दृष्टः। तं | विश्वरूपं | भवभूतमीड्यं | | देवं | स्वचित्तस्थमुपास्य | पूर्वम् ॥ ५ ॥
सः=वह; आदिः=आदि कारण (परमात्मा); त्रिकालात् परः=तीनों कालोंसे सर्वथा अतीत; (एवं) अकलः=कलारहित (होनेपर); अपि=भी; संयोगनिमित्त-