ईशादि नौ उपनिषद्
Ishadi Nau Upanishad
ऋषिगण द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 507, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६ ]
श्वेताश्वतरोपनिषद्
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(परमात्माने ही) तत्=उस (जडतत्त्वोंकी रचनारूप); कर्म=कर्मको; कृत्वा=करके; विनिवर्त्य=उसका निरीक्षण कर; भूयः=फिर; तत्त्वस्य=चेतनतत्त्वका; तत्त्वेन=जड-तत्त्वसे; योगम्=संयोग; समेत्य=कराके; वा=अथवा यों समझिये कि; एकेन=एक (अविद्या) से; द्वाभ्याम्=दो (पुण्य और पापरूप कर्मों) से; त्रिभिः=तीन गुणोंसे; च=और; अष्टभिः=आठ प्रकृतियोंके साथ; कालेन=कालके साथ; च=तथा; सूक्ष्मैः आत्मगुणैः=आत्मसम्बन्धी सूक्ष्म गुणोंके साथ; एव=भी; [ योगम् समेत्य ]=इस जीवका सम्बन्ध कराके (इस जगत्की रचना की है) ॥ ३ ॥
व्याख्या —परमेश्वरने ही अपनी शक्तिभूता मूलप्रकृतिसे पाँचों स्थूल महाभूत आदिकी रचनारूप कर्म करके उसका निरीक्षण किया, फिर जडतत्त्वके साथ चेतन तत्त्वका संयोग कराके नाना रूपोंमें अनुभव होनेवाले विचित्र जगत्की रचना की।* अथवा इस प्रकार समझना चाहिये कि एक अविद्या, दो पुण्य और पापरूप संचित कर्म-संस्कार, सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण और एक काल तथा मन, बुद्धि, अहंकार, पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये आठ प्रकृतिभेद, इन सबसे तथा अहंता, ममता, आसक्ति आदि आत्मसम्बन्धी सूक्ष्म गुणोंसे जीवात्माका सम्बन्ध कराके इस जगत्की रचना की। इन दोनों प्रकारके वर्णनोंका तात्पर्य एक ही है ॥ ३ ॥
सम्बन्ध —इस रहस्यको समझकर साधकको क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहा जाता है—
आरभ्य कर्माणि गुणान्वितानि भावांश्च सर्वान् विनियोजयेद् यः। तेषामभावे कृतकर्मान्नाशः कर्मक्षये याति स तत्त्वतोऽन्यः ॥ ४ ॥
- इसका वर्णन तैत्तिरीय-उपनिषद् (ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवाक १ और ६) में, ऐतरेयोपनिषद् (अध्याय १ के तीनों खण्डों)में, छान्दोग्योपनिषद् (अध्याय ६, खण्ड २-३)में और बृहदारण्यकोपनिषद् (अध्याय १, ब्राह्मण २) में विस्तारपूर्वक आया है।